अर॒मश्वा॑य गायति श्रु॒तक॑क्षो॒ अरं॒ गवे॑ । अर॒मिन्द्र॑स्य॒ धाम्ने॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
aram aśvāya gāyati śrutakakṣo araṁ gave | aram indrasya dhāmne ||
पद पाठ
अर॑म् । अश्वा॑य । गा॒य॒ति॒ । श्रु॒तऽक॑क्षः । अर॑म् । गवे॑ । अर॑म् । इन्द्र॑स्य । धाम्ने॑ ॥ ८.९२.२५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:92» मन्त्र:25
| अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:19» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:25
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अश्व-गौ-इन्द्रधाम
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (श्रुतकक्षः) = ज्ञान को ही अपना रक्षा-स्थान बनानेवाला [ कक्ष hiding place ] यह उपासक (अश्वाय) = उत्तम कर्मेन्द्रियों की प्राप्ति के लिये (अरं गायति) = खूब ही प्रभु का गायन करता है। यह (गवे) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियों की प्राप्ति के लिये (अरम्) = खूब ही गायन करता है। [२] इसी प्रकार (इन्द्रस्य) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के (धाम्ने) = तेज के लिये (अरम्) = खूब ही गायन करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'श्रुतकक्ष' बनें। स्वाध्याय द्वारा व्यर्थ के व्यसनों से बचकर उत्तम कर्मेन्द्रियों उत्तम ज्ञानेन्द्रियों में प्रभु के तेज को पाने के लिये खूब ही प्रभु का गायन करें।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The sage, having drunk of the soma of divine love, sings in praise of the dynamics of motion and attainment and the music overflows, he sings of the dynamics of creative production and power of communication such as waves of energy, earth and cows, and he sings profusely of the lord’s refulgent forms of wealth, beauty and excellence.
