विश्वासाह-शतक्रतु प्रभु का गायन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे मित्रो ! (वः) = तुम्हारे (अन्धसः) = सोम का, वीर्यशक्ति का (आपान्तम्) = सर्वतः रक्षण करनेवाले (इन्द्रम्) = उस (शत्रु) = विद्रावक प्रभु का (अभि प्रगायत) = दिन के दोनों ओर प्रातः - सायं गायन करो। प्रभु-स्तवन से ही प्रत्येक दिन को प्रारम्भ करो और प्रभु-स्तवन ही प्रत्येक दिन का अन्तिम कार्य हो। [२] उन प्रभु का गायन करो जो (विश्वासाहम्) = सब शत्रुओं का पराभव करनेवाले हैं। (शतक्रतुम्) = अनन्त प्रज्ञान व शक्तिवाले हैं। तथा (चर्षणीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों के (मंहिष्ठम्) = सर्वोत्तम दाता हैं, इनके लिये सब ऐश्वर्यों के प्राप्त करानेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उपासक के सब शत्रुओं का पराभव करते हैं। उसके लिये शक्ति व प्रज्ञान को प्राप्त कराके सब ऐश्वर्यों को प्राप्त कराते हैं। हम प्रतिदिन प्रातः सायं प्रभु का गायन करें।