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इ॒मानि॒ त्रीणि॑ वि॒ष्टपा॒ तानी॑न्द्र॒ वि रो॑हय । शिर॑स्त॒तस्यो॒र्वरा॒मादि॒दं म॒ उपो॒दरे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imāni trīṇi viṣṭapā tānīndra vi rohaya | śiras tatasyorvarām ād idam ma upodare ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒मानि॑ । त्रीणि॑ । वि॒ष्टपा॑ । तानि॑ । इ॒न्द्र॒ । वि । रो॒ह॒य॒ । शिरः॑ । त॒तस्य॑ । उ॒र्वरा॑म् । आत् । इ॒दम् । मे॒ । उप॑ । उ॒दरे॑ ॥ ८.९१.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:91» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिलोकी का उत्कर्ष

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (इमानि) = ये (त्रीणि) = तीन (विष्टपा) = लोक हैं। यह शरीर ही पृथिवीलोक है, हृदय अन्तरिक्षलोक है तथा मस्तिष्क ही द्युलोक है। हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (तानि विरोहय) = उन तीनों लोकों को विशिष्टरूप से उन्नत करिये। [२] (शिर:) = मेरा मस्तिष्क (ततस्य) = अत्यन्त विस्तृत ज्ञान का भण्डार हो । मेरी हृदयभूमि को आप (उर्वराम्) = खूब उर्वरा करिये - यह हृदयक्षेत्र नीरस न हो। यह क्षेत्र स्नेह की भावनाओं की उत्पत्ति के लिये उर्वर हो। (आत्) = अब (इदम्) = यह वीर्य (मे) = मेरे (उदरे) = उदर में (उप) = समीपता से रहे। शक्ति का मेरे अन्दर रक्षण करिये। मस्तिष्क ज्ञान का, हृदय स्नेह का शरीर वीर्य [शक्ति] का उत्पत्तिस्थल बने।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु मेरी त्रिलोकी को उत्कृष्ट बनाएँ। मस्तिष्करूप द्युलोक विस्तृत ज्ञान के प्रकाश का आधार बने। हृदय प्रेम की भावनाओं का उर्वर क्षेत्र हो । शरीर शक्ति का आधार हो ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - These are three vital systemic organs of the growing and continuous body existence which, O soma energy, raise and refine: One is the head, seat of the intelligential system, the other is heart and lungs, seat of pranic system, and yet another is the stomach and pelvic region, seat of nutritional and sexual system. Indra, lord of energy and power, let these three grow to maturity.