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कु॒विच्छक॑त्कु॒वित्कर॑त्कु॒विन्नो॒ वस्य॑स॒स्कर॑त् । कु॒वित्प॑ति॒द्विषो॑ य॒तीरिन्द्रे॑ण सं॒गमा॑महै ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kuvic chakat kuvit karat kuvin no vasyasas karat | kuvit patidviṣo yatīr indreṇa saṁgamāmahai ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कु॒वित् । शक॑त् । कु॒वित् । कर॑त् । कु॒वित् । नः॒ । वस्य॑सः । कर॑त् । कु॒वित् । प॒ति॒ऽद्विषः॑ । य॒तीः । इन्द्रे॑ण । स॒म्ऽगमा॑महै ॥ ८.९१.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:91» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विषयोन्मुख इन्द्रियों को विषयपराङ्‌मुख करना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु सोमरक्षण द्वारा (कुवित्) = खूब ही (शकत्) = हमें शक्तिशाली बनाते हैं। (कुवित्) = खूब ही (करत्) = [कृ विक्षेपे] शत्रुओं को विक्षिप्त करते हैं और इस प्रकार (नः) = हमें (कुवित्) = खूब ही (वस्यसः) = प्रशस्त वसुओंवाला करते हैं। [२] हम भी इन (पतिद्विषः) = उस पति प्रभु से प्रीति न करनेवाली [द्विष् अप्रीतौ] (कुवित् यती:) = खूब ही इधर-उधर विषयों में भटकती हुई इन्द्रियों को इन्द्रेण उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के साथ संगमामहै संगत करते हैं। इन्द्रियों को विषयव्यावृत्त कर प्रभु की ओर प्रेरित करना ही मानवजीवन की उत्कृष्ट साधना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण द्वारा शक्ति बढ़ती है, वासनाविनाश होता है और प्रशस्त वसुओं की प्राप्ति होती है। हम विषयोन्मुख इन्द्रियों को प्रभुप्रवण करने का यत्न करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May soma give us strength and vigour. May it work for our all round improvement in personality. May it make us happier and wealthier. And may be then we, not yet in favour of matrimony and husbands, grow up, reconcile and regain their love.