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अ॒सौ य एषि॑ वीर॒को गृ॒हंगृ॑हं वि॒चाक॑शद् । इ॒मं जम्भ॑सुतं पिब धा॒नाव॑न्तं कर॒म्भिण॑मपू॒पव॑न्तमु॒क्थिन॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asau ya eṣi vīrako gṛhaṁ-gṛhaṁ vicākaśad | imaṁ jambhasutam piba dhānāvantaṁ karambhiṇam apūpavantam ukthinam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒सौ । यः । एषि॑ । वी॒र॒कः । गृ॒हम्ऽगृ॑हम् । वि॒ऽचाक॑शत् । इ॒मम् । जम्भ॑ऽसुतम् । पि॒ब॒ । धा॒नाऽव॑न्तम् । क॒र॒म्भिण॑म् । अ॒पू॒पऽव॑न्तम् । उ॒क्थिन॑म् ॥ ८.९१.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:91» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जम्भसुत का पान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (यः) = जो आप (वीरकः) = शत्रुओं को अतिशयेन कम्पित करके करनेवाले दूर हैं [वि + ईर] (असौ) = वे आप (एषि) = प्राप्त होते हैं और (गृहंगृहं विचाकशत्) = प्रत्येक गृह को दीप्त करनेवाले होते हैं। हमारे हृदयों में प्रभु का प्रकाश होते ही सारा शरीरगृह चमक उठता है। [२] हे प्रभो ! (इमम्) = इस (जम्भसुतम्) = जबड़ों के द्वारा उत्पन्न किये गये जबड़ों से चबाकर खाये गये भोजन से उत्पन्न होनेवाले सोम को (पिब) = शरीर में ही पीने का अनुग्रह करिये। यह सोम (धानावन्तम्) = शरीर के धारण करनेवाला है। (करम्भिणम्) = [क+रम्भ] आनन्द के साथ आलिंगनवाला है - जीवन को आनन्दमय बनाता है । (अपूपवन्तम्) = [अपूप-Honey-comb] शहद के छत्तेवाला है, अर्थात् वाणी को शहद के समान मधुर बनानेवाला है । (उक्थिनम्) = स्तोत्रोंवाला है - यह सोम सुरक्षित होकर इस रक्षक पुरुष को प्रभुस्तवन की वृत्तिवाला बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का प्रकाश होते ही यह शरीरगृह चमक उठता है। शरीर में सोमरक्षण होकर जीवन 'स्थिर शक्तिवाला, आनन्दमय, मधुर व प्रभुस्तवन की वृत्तिवाला' बनता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The invigorating juice of soma which gives strength and vigour of health and radiates from person to person, family to family, O maiden, O youth, drink. It is expressed and invigorated to the last drop. It is delicious, nourishing, seasoned with delicacies, fresh and exhilarating, and invigorating with pranic energies.