'सन्तोष - ज्ञान व स्वास्थ्य' रूप धन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] मानव जीवन को सुखी करनेवाला धन 'नृम्ण' कहलाता है। हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (यत्) = जो (नृम्णम्) = धन (अन्तरिक्षे) = हृदयान्तरिक्ष में होता है। अर्थात् जो सन्तोष-आत्मतृप्ति-रूप धन हृदय में निवास करता है, (तत्) = उस धन को (धत्तम्) = हमारे लिये धारण करिये। प्राणसाधना से हृदय निर्मल होता है, चित्तवृत्ति बाह्य धनों के लिये बहुत लालायित नहीं होती। इस प्रकार हृदय में एक सन्तोष के आनन्द का अनुभव होता है। [२] (यत्) = जो (दिवि) = मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान-धन है, उसे आप हमारे लिये धारण करिये। प्राणसाधना से काम-वासना का विनाश होकर ज्ञानदीप्ति प्राप्त होती है। [२] हे प्राणापानो ! (यत्) = जो (पञ्च) = पाँच, (मानुषान्) = मानव सम्बन्धी वस्तुओं के (अनु) = अनुकूलतावाला धन है, उसे आप हमारे लिये प्राप्त कराइये मानव सम्बन्धी पाँच वस्तुएँ सर्वप्रथम शरीर के बनानेवाले पाँच महाभूत हैं 'पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश'। फिर पाँच प्राण हैं, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व पाँच 'मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व हृदय' हैं। इन सब के अनुकूल धनों को ये प्राणापान हमारे लिये प्राप्त करायें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदय के सन्तोषरूप धन को, मस्तिष्क के ज्ञानरूप धन को तथा मानव पञ्चकों के पूर्ण स्वास्थ्यरूप धन को ये प्राणापान हमारे लिये प्राप्त करायें।