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यद॒द्याश्विना॑व॒हं हु॒वेय॒ वाज॑सातये । यत्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॒ सह॒स्तच्छ्रेष्ठ॑म॒श्विनो॒रव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad adyāśvināv ahaṁ huveya vājasātaye | yat pṛtsu turvaṇe sahas tac chreṣṭham aśvinor avaḥ ||

पद पाठ

यत् । अ॒द्य । अ॒श्विनौ॑ । अ॒हम् । हु॒वेय॑ । वाज॑ऽसातये । यत् । पृ॒त्ऽसु । तु॒र्वणे॑ । सहः॑ । तत् । श्रेष्ठ॑म् । अ॒श्विनोः॑ । अवः॑ ॥ ८.९.१३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:9» मन्त्र:13 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:32» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:13


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शिव शंकर शर्मा

राजकर्त्तव्य कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (अद्य) आजकल (यद्) जब-२ (अहम्) मैं (वाजसातये) न्याय करवाने के लिये (अश्विनौ) प्रजानियोजित पुण्यकृत राजा और अमात्यवर्ग को (हुवेय) बुलाता हूँ, तब-२ वे अवश्य आते हैं, क्योंकि (पृत्सु) दुष्ट सेनाओं की (तुर्वणे) हिंसा करने में (यत्+सहः) जो उनका अभिभवकारी तेज है (तत्) वह (अश्विनोः) अश्विद्वय का (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ (अवः) रक्षण है, अतः उनको आप लोग भी बुलाया करें ॥१३॥
भावार्थभाषाः - जब-२ विद्वान् या मूर्ख प्रजा राजा को न्यायार्थ बुलावें, तब-२ शीघ्र राजा वहाँ पहुँचे ॥१३॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विनौ) हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! (यत्, अद्य) जो इस समय (वाजसातये) युद्ध में बलप्राप्ति के लिये (अहं, हुवेय) हम आपका आह्वान करें (यत्) और जो (पृत्सु) युद्धों में (तुर्वणे) शत्रुहिंसन के लिये आह्वान करें (तत्) तो उसका यही हेतु है कि (अश्विनोः) आपका (सहः) बल (अवः) तथा रक्षण (श्रेष्ठम्) सबसे अधिक है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! यदि हमें अपनी रक्षा के लिये शत्रुओं के सन्मुख होकर युद्ध करना पड़े, तो आप हमारे रक्षक हों, क्योंकि आप बलवान् होने से विद्वानों की सदैव रक्षा करनेवाले हैं ॥१३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्रेष्ठं अवः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (अद्य) = आज (अहम्) = मैं (अश्विनौ) = प्राणापान का (हुवेय) = आह्वान करूँ, यदि मैं प्राणसाधना में प्रवृत्त होऊँ, तो ये प्राणापान (वाजसातये) = मुझे शक्ति को प्राप्त कराने के लिये हों। [२] (यत्) = क्योंकि प्राणसाधना से (पृत्सु) = संग्रामों में (तुर्वणे) = शत्रुओं के हिंसन के निमित्त (सहः) = बल प्राप्त होता है, (तत्) = सो (अश्विनो:) = इन प्राणापान का (अवः) = रक्षण (श्रेष्ठम्) = श्रेष्ठ है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना के द्वारा शक्ति प्राप्त होती है। शक्ति से शत्रुओं का मर्षण होता है। इस प्रकार प्राणों द्वारा प्राप्त होनेवाला रक्षण श्रेष्ठ है।
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शिव शंकर शर्मा

राजकर्त्तव्यमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः। अद्य=सम्प्रति। यद्=यदा। अहम्=विद्वान् विज्ञाता। अश्विनौ=प्रजानियोजितौ पुण्यकृतौ राजानौ। वाजसातये=न्यायप्राप्तये। हुवेय=आह्वयामि। तदा। तावागच्छतः। यतः। पृत्सु=पृतनासु=सेनासु। सेनानां तुर्वणे=हिंसने। यत् सहस्तेजोऽभिभवकारकं वर्तते। तद्। अश्विनौ श्रेष्ठमवोरक्षणं विद्यते। अतो यूयमपि तौ सदाऽऽह्वयत ॥१३॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विनौ) हे अश्विनौ ! (यत्, अद्य) यत्सम्प्रति (वाजसातये) युद्धे बलप्राप्तये (अहम्, हुवेय) अहमाह्वयानि (यत्) यच्च (पृत्सु) युद्धेषु (तुर्वणे) शत्रुनाशाय त्वां ह्वयानि (तत्) तत्कारणम् (अश्विनोः) अश्विनोर्युवयोः (सहः) बलम् (अवः) रक्षणं च (श्रेष्ठम्) प्रशस्तमस्ति ॥१३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When I call upon the Ashvins, defenders of humanity and protectors of life, for the sake of victory in our struggle for existence, or I call on them against the enemies in our conflicts with negativities, they would come, because their courage and force for the defence and protection of life is highest and best.