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तत्ते॑ य॒ज्ञो अ॑जायत॒ तद॒र्क उ॒त हस्कृ॑तिः । तद्विश्व॑मभि॒भूर॑सि॒ यज्जा॒तं यच्च॒ जन्त्व॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tat te yajño ajāyata tad arka uta haskṛtiḥ | tad viśvam abhibhūr asi yaj jātaṁ yac ca jantvam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत् । ते॒ । य॒ज्ञः । अ॒जा॒य॒त॒ । तत् । अ॒र्कः । उ॒त । हस्कृ॑तिः । तत् । विश्व॑म् । अ॒भि॒ऽभूः । अ॒सि॒ । यत् । जा॒तम् । यत् । च॒ । जन्त्व॑म् ॥ ८.८९.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:89» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ + अर्क-वासनाविनाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! गतमन्त्र के अनुसार हृदयों में आपके प्रादुर्भाव होने पर (तत्) = तब (ते) = आपका (यज्ञः) = पूजन [यज्ञ=देवपूजा] (अजायत) = हमारे जीवनों में प्रादुर्भूत होता है। हम आपकी पूजा करनेवाले बनते हैं (उत) = और (तत्) = तब (हस्कृतिः) = हास - प्रकाश व हर्ष को करनेवाला (अर्क:) = आपका स्तवन प्रादुर्भूत होता है। हम आपके स्तवन में प्रवृत्त होते हैं। यह स्तवन हमारे अद्भुत हर्ष का साधन बनता है। [२] (तत्) = तब आप (यत् जातम्) = जो क्रोध आदि शत्रु हमारे यहाँ उत्पन्न हो चुके हैं- दृढमूल से बन गये हैं यच्च और जो (जन्त्वम्) = पैदा होने की तैयारी में हैं - अंकुरित हो रहे हैं (तद् विश्वम्) = उन सब को आप (अभिभूः असि) = अभिभूत करनेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदयों में प्रभु का प्रादुर्भाव होते ही [१] जीवन यज्ञमय बन जाता है, [२] हम प्रभुस्तवन में हर्ष का अनुभव करने लगते हैं, [३] सब उत्पन्न हो चुकी व हो रही क्रोध आदि की वासनाओं को अभिभूत कर लेते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And then proceeds the cosmic yajna, formation of light, sun and the joyous agni and vayu. And thus you remain and rule as the supreme over what has come into being and what is coming into being.