पृथिवी प्रथन व द्युलोक स्तम्भन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अपूर्व्य) = सबसे पूर्व विद्यमान - स्वतो व्यतिरिक्त पूर्व्य से रहित (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यत्) = जब (जायथाः) = आपका हमारे हृदयों में प्रादुर्भाव होता है, तो (वृत्रहत्याय) = यह प्रादुर्भाव वासना के विनाश के लिये कारण बनता है। आपका प्रादुर्भाव होते ही ज्ञान के प्रकाश में वासनान्धकार का विलय हो जाता है। [२] (तत्) = तब आप (पृथिवीम्) = इस शरीररूप पृथिवी का (अप्रथय:) = विस्तार करते हैं। (उत) = और (द्याम्) = मस्तिष्करूप द्युलोक को (अस्तभ्नाः) = थामते हैं। आपका प्रादुर्भाव वासना को विनष्ट करके शरीर की शक्तियों का विस्तार करता है और ज्ञान ज्योति को दीप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदयों में प्रभु का प्रादुर्भाव होते ही वासना का दहन हो जाता है इससे शरीर में रेत कणों का रक्षण होकर शक्तियों का विस्तार होता है और ज्ञान का दीपन होता है।