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अ॒भि प्र भ॑र धृष॒ता धृ॑षन्मन॒: श्रव॑श्चित्ते असद्बृ॒हत् । अर्ष॒न्त्वापो॒ जव॑सा॒ वि मा॒तरो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॒ स्व॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi pra bhara dhṛṣatā dhṛṣanmanaḥ śravaś cit te asad bṛhat | arṣantv āpo javasā vi mātaro hano vṛtraṁ jayā svaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । प्र । भ॒र॒ । धृ॒ष॒ता । धृ॒ष॒त्ऽम॒नः॒ । श्रवः॑ । चि॒त् । ते॒ । अ॒स॒त् । बृ॒हत् । अर्ष॑न्तु । आपः॑ । जव॑सा । वि । मा॒तरः॑ । हनः॑ । वृ॒त्रम् । जय॑ । स्वः॑ ॥ ८.८९.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:89» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'हनो वृत्रं जया स्वः '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (धृषन्मनः) = शत्रुओं के धर्षणशील मनवाले इन्द्र ! (ते) = आपका (बृहत्) = महान् (श्रवः) = ज्ञान (चित्) = निश्चय से (असत्) = है । आप (धृषता) = शत्रुओं के धर्षक मन के साथ उस ज्ञान को (अभि प्रभर) = हमारे लिये सर्वतः भरिये । [२] इस ज्ञान के द्वारा वासना का विनाश होकर (वि-मातरः) = विशिष्टरूप से हमारा निर्माण करनेवाले अतएव मातृभूत (आपः) = शरीरस्थ रेतःकण [ आप- रेतो भूत्वा० ] (जवसा) = वेग के साथ (अर्षन्तु) = शरीर के अंग-प्रत्यंग में गतिवाले हों। इन रेतःकणों का शरीर में ही व्यापन हो। इसी उद्देश्य से, हे प्रभो! आप (वृत्रम्) = हमारे वासनारूप शत्रु को (हनः) = विनष्ट करिये तथा (स्वः जया) = हमारे लिये प्रकाश व सुख का विजय करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें शत्रुधर्षक ज्ञानबल को प्राप्त कराएँ । वासनाविनाश के द्वारा शक्तिकणों का शरीर में ही संयम हो और हमारा जीवन प्रकाश व सुख से सम्पन्न हो ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man of determined mind, boldly with confidence as that of Maruts, offer adorations to Indra. Let your honour and fame rise and ring far and wide and hold it well under control with a bold mind. Let the mother-like pranic energies run through the veins with vitality, destroy evil and darkness, and win the light of heaven.