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अपा॑धमद॒भिश॑स्तीरशस्ति॒हाथेन्द्रो॑ द्यु॒म्न्याभ॑वत् । दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे॒ बृह॑द्भानो॒ मरु॑द्गण ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apādhamad abhiśastīr aśastihāthendro dyumny ābhavat | devās ta indra sakhyāya yemire bṛhadbhāno marudgaṇa ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अप॑ । अ॒ध॒म॒त् । अ॒भिऽश॑स्तीः । अ॒श॒स्ति॒ऽहा । अथ॑ । इन्द्रः॑ । द्यु॒म्नी । आ । अ॒भ॒व॒त् । दे॒वाः । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । स॒ख्याय॑ । ये॒मि॒रे॒ । बृह॑द्भानो॒ इति॒ बृह॑त्ऽभानो । मरु॑त्ऽगण ॥ ८.८९.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:89» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अशस्तिहा - द्युम्नी' इन्द्र

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अशस्तिहा) = सब अप्रशस्त भावों का विनाश करनेवाला (इन्द्रः) = वह शत्रुसंहारक प्रभु (अभिशस्तीः) = शत्रुकृत हिंसनों को (अप अधमत्) = हमारे से सुदूर विनष्ट करता है और (अथ) = अब वह प्रभु (द्युम्नी आभवत्) = हमारे लिये सर्वतः ज्ञान की ज्योतियोंवाला होता है। इन ज्ञानज्योतियों से प्रभु हमारे जीवन को उज्ज्वल कर देते हैं। [२] हे (बृहद्मानो) = महान् दीप्तिवाले ! (मरुद्गण) = मरुतों के-प्राणों के गणोंवाले, अर्थात् प्राणसमूह को प्राप्त करानेवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (ते सख्याय) = आपकी मित्रता के लिये (येमिरे) = अपने जीवन को संयमवाला बनाते हैं। प्राणसाधना व (स्वाध्याय) = द्वारा ज्ञानप्राप्ति ही संयम का साधन बनती हैं और हमें प्रभु की मित्रता का पात्र बनाती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें काम-क्रोध आदि शत्रुओं के हिंसन से बचाते हैं और ज्ञान ज्योति से हमारे जीवन को दीप्त करते हैं। हमें चाहिए कि प्राणापान व स्वाध्याय द्वारा संयत जीवनवाले बनकर प्रभु की मित्रता के पात्र बनें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra bums and blows away all curses and calumnies and shines in power and glory beyond scandalous criticism. O refulgent lord of power and force, commanding the host of Maruts, vibrant leading forces of nature and humanity, brilliant and generous sages and divines try to achieve kinship as friends with you.