पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ते) = आपके (मधस्य) = ऐश्वर्य का (नकिः परिष्टिः) = कोई भी रोकनेवाला [परिबाधकः] नहीं है, (यद्) = जब (दाशुषे) = दानशील पुरुष के लिये आप (दशस्यसि) = देते हैं। प्रभु जब दाश्वान् को धन प्राप्त कराते हैं, तो कोई रोक थोड़े ही सकता है। [२] हे प्रभो ! आप (अस्माकम्) = हमारा (बोधि) = [बुध्यस्व] ध्यान करिये आप ही (उचथस्य चोदिता) = स्तोत्रों के प्रेरक हैं। आपकी प्रेरणा से ही हम स्तवन में प्रवृत्त हो पाते हैं। आप (मंहिष्ठः) = सर्वमहान् दाता हैं। आप ही (वाजसातये) = शक्ति को प्राप्त कराने के लिये होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु दानशील पुरुष को धन प्राप्त कराते हैं। वे हमारे जीवनों में स्तोत्रों के प्रेरक होते हैं। वे सर्वमहान् दाता प्रभु हमें शक्ति को प्राप्त कराते हैं। यह दानशील पुरुष 'नृ-मेध' बनता है - सब पुरुषों के साथ मेलवाला होता है। इसका यह मेल पालन व पूरण के लिये होता है, सो यह 'पुरुमेध' कहलाता है। यह सब से यही कहता है कि हम प्रभु का गायन करें-