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ऋ॒तेन॑ दे॒वः स॑वि॒ता श॑मायत ऋ॒तस्य॒ शृङ्ग॑मुर्वि॒या वि प॑प्रथे । ऋ॒तं सा॑साह॒ महि॑ चित्पृतन्य॒तो मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtena devaḥ savitā śamāyata ṛtasya śṛṅgam urviyā vi paprathe | ṛtaṁ sāsāha mahi cit pṛtanyato mā no vi yauṣṭaṁ sakhyā mumocatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋ॒तेन॑ । दे॒वः । स॒वि॒ता । श॒म्ऽआ॒य॒ते॒ । ऋ॒तस्य॑ । शृङ्ग॑म् । उ॒र्वि॒या । वि । प॒प्र॒थे॒ । ऋ॒तम् । स॒सा॒ह॒ । महि॑ । चि॒त् । पृ॒त॒न्य॒तः । मा । नः॒ । वि । यौ॒ष्ट॒म् । स॒ख्या । मु॒मोच॑तम् ॥ ८.८६.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:86» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सविता देवः) = वह प्रेरक प्रकाशमय प्रभु (ऋतेन) = ऋत के द्वारा (शमायते) = हमारे जीवनों को बड़ा शान्त बनाता है । (ऋतस्य श्रृंगम्) = ऋत का (श्रृंग) = शत्रुनाशक बल (उर्विया वि पप्रथे) = खूब ही विस्तृत होता है। सत्य हमें जहाँ शान्ति प्राप्त कराता है, वहाँ हमारे काम-क्रोध आदि शत्रुओं को भी विनष्ट करता है। [२] (ऋजम्) = यह ऋत (महि चित् पृतन्यतः) = महान् भी शत्रुओं को (सासाह) = पराभूत करता है। प्राणापान ही इस ऋत के प्राप्त करानेवाले हैं-प्राणसाधना द्वारा जीवन अनृत से रहित होकर ऋतवाला बनता है। सो, प्राणापानो! (नः) = हमें (मा वि यौष्टम्) = छोड़ मत जाओ । (सख्या) = अपनी मित्रताओं को हमें प्राप्त कराओ। (मुमोचतम्) = हमें सब शत्रुओं से मुक्त करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ऋत हमारे जीवन को शान्त करता है ऋत हमारे सब शत्रुओं को नष्ट करता है। प्राणसाधना द्वारा हम जीवन को ऋतमय बनाएँ । अगले सूक्त का ऋषि भी 'कृष्ण आंगिरस' है। अथवा 'प्रियमेध आंगिरस' भी कहा गया है- प्रियमेधावाला-शक्तिवाली अंगोंवाला। यह 'अश्विनौ' का स्तवन करता हुआ कहता है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Self-refulgent Savita, creator and energiser, blesses with peace, truth and the laws of life, and he expands the law of life with the expansive universe. Truth and the law of truth overcomes the challenges of even the mightiest opponents. Ashvins, complementary powers of Savita, forsake us not, deprive us not of your friendship, give us freedom by that friendship.