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उ॒त त्यं वी॒रं ध॑न॒सामृ॑जी॒षिणं॑ दू॒रे चि॒त्सन्त॒मव॑से हवामहे । यस्य॒ स्वादि॑ष्ठा सुम॒तिः पि॒तुर्य॑था॒ मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta tyaṁ vīraṁ dhanasām ṛjīṣiṇaṁ dūre cit santam avase havāmahe | yasya svādiṣṭhā sumatiḥ pitur yathā mā no vi yauṣṭaṁ sakhyā mumocatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त । त्यम् । वी॒रम् । ध॒न॒ऽसाम् । ऋ॒जी॒षिण॑म् । दू॒रे । चि॒त् । सन्त॑म् । अव॑से । ह॒वा॒म॒हे॒ । यस्य॑ । स्वादि॑ष्ठा । सु॒ऽम॒तिः । पि॒तुः । य॒था॒ । मा । नः॒ । वि । यौ॒ष्ट॒म् । स॒ख्या । मु॒मोच॑तम् ॥ ८.८६.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:86» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्वादिष्ठा' सुमतिः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! हम (उत) = निश्चय से (त्यम्) = उस (वीरम्) = [वि ईर] शत्रुओं को कम्पित करनेवाले (धनसाम्) = धनों को प्राप्त करानेवाले (ऋजीषिणम्) = ऋजुमार्ग की प्रेरणा देनेवाले, (दूरे चित् सन्तम्) = दूर से दूर प्रदेश में भी वर्तमान उस प्रभु को अवसे हवामहे रक्षण के लिये पुकारते हैं। [२] उस प्रभु को हम पुकारते हैं, (यस्य) = जिसकी (यथा पितुः) = जैसे एक पिता की, अर्थात् पिता की ओर से पुत्र के लिये दी गई (सुमतिः) = कल्याणी मति (स्वादिष्ठा) = जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाली है। हे प्राणापानो! आप (नः) = हमें (मा वि यौष्टम्) = हमारे से पृथक् न होओ। (सख्या) = अपनी मैत्रियों को मत नष्ट करो। (मुमोचतम्) = आप हमें सब रोगों व वासनारूप शत्रुओं से छुड़ाओ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभुस्मरण पूर्वक प्राणसाधना में प्रवृत्त हों। हमें वह सुमति प्राप्त हो जो जीवन को मधुरतम बनाती है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We call for that mighty energy of prana which is the source of wealth, simple and natural cleanser and strengthener of body and mind, which though it may be far off, still whose sweetest gift of nourishment of intelligence is like the gift of nature, father, and omniscient God. Ashvins, pray bring us that energy, forsake us not, deprive us not of your friendship, save us with that friendship.