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क॒था नू॒नं वां॒ विम॑ना॒ उप॑ स्तवद्यु॒वं धियं॑ ददथु॒र्वस्य॑इष्टये । ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kathā nūnaṁ vāṁ vimanā upa stavad yuvaṁ dhiyaṁ dadathur vasyaïṣṭaye | tā vāṁ viśvako havate tanūkṛthe mā no vi yauṣṭaṁ sakhyā mumocatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क॒था । नू॒नम् । वा॒म् । विऽम॑नाः । उप॑ । स्त॒व॒त् । यु॒वम् । धिय॑म् । द॒द॒थुः॒ । वस्यः॑ऽइष्टये । ता । वा॒म् । विश्व॑कः । ह॒व॒ते॒ । त॒नू॒ऽकृ॒थे । मा । नः॒ । वि । यौ॒ष्ट॒म् । स॒ख्या । मु॒मोच॑तम् ॥ ८.८६.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:86» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धियं, वस्यः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विमनाः) = विविध दिशाओं में भागनेवाले मनवाला यह 'विमनाः' के लिये प्राणसाधना कठिन हो जाती है। सो हम मन को एकाग्र करने के लिये इस प्राणसाधना में प्रवृत्त हों। हे प्राणापानो ! (युवम्) = आप ही (इष्टये) = इष्ट प्राप्ति के लिये (धियम्) = बुद्धि को तथा (वस्य:) = प्रशस्त धन को (ददथुः) = देते हो। [२] (ता वाम्) = उन आप दोनों को (विश्वकः) = यह पूर्ण उन्नति को अपनानेवाला (तनूकृथे) = शत्रुओं को क्षीण करने के निमित्त (हवते) = पुकारता है। हे प्राणापानो! (नः) = हमें (मावि यौष्टम्) = छोड़ मत जाओ । (सख्या) = मित्रताओं को नष्ट मत कर दो। आप अवश्य ही (मुमोचतम्) = हमें रोगों व वासनारूप शत्रुओं से मुक्त करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से मनोवृत्ति एकाग्र होती है। इससे उत्तम बुद्धि व प्रशस्त धन प्राप्त होता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - How can a person disturbed in the mind study and honour you for the control of complementary pranic energies of prana and apana? When the pranic energies are controlled in meditation, you give the practitioner the intelligential capacity to achieve the desired concentration for peace and power of the mind. Ashvins, the universal lover of health invokes you for the system’s efficacy. Pray forsake us not, deprive us not of your natural friendship.