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देवता: अग्निः ऋषि: उशना काव्यः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

कया॑ ते अग्ने अङ्गिर॒ ऊर्जो॑ नपा॒दुप॑स्तुतिम् । वरा॑य देव म॒न्यवे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kayā te agne aṅgira ūrjo napād upastutim | varāya deva manyave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कया॑ । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒ङ्गि॒रः॒ । ऊर्जः॑ । नपा॑त् । उप॑ऽस्तुतिम् । वरा॑य । दे॒व॒ । म॒न्यवे॑ ॥ ८.८४.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:84» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:5» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अग्नि, अंगिराः, ऊर्जोनपात् व देव'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (अंगिरः) = अंग-प्रत्यंग में रस का सञ्चार करनेवाले प्रभो ! (ऊर्जो न पात्) = शक्ति को न नष्ट होने देनेवाले प्रभो ! हम (कया) = किस वाणी से (ते उपस्तुतिम्) = आपके स्तवन को करें? अर्थात् शब्दों से आपके स्तवन करने का सम्भव नहीं । आपकी महिमा शब्दातीत है । [२] हे (देव) = प्रकाशमय प्रभो! आप ही (वराय मन्यवे) = उत्कृष्ट ज्ञान के लिये होते हैं। आपकी उपासना से ही हमें ज्ञान प्राप्त होता है। आपकी उपासना ही हमें प्रगतिशील [अग्नि] रसमय अंगोंवाला [अंगिरः] व स्थिर बलवाला [ऊर्जोनपात्] बनाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की महिमा शब्दों से वर्णनीय नहीं । प्रभु का उपासन हमें प्रगतिशील, रसमय अंगोंवाला, स्थिरशक्ति व उत्कृष्ट ज्ञानवाला बनाता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O creator, preserver and protector of energy, dear as breath of life and vitality of existence, with words of beauty and bliss, O light of the world, we offer our homage and adoration to you, lord refulgent and great.