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यो अ॒प्सु च॒न्द्रमा॑ इव॒ सोम॑श्च॒मूषु॒ ददृ॑शे । पिबेद॑स्य॒ त्वमी॑शिषे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo apsu candramā iva somaś camūṣu dadṛśe | pibed asya tvam īśiṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । अ॒प्ऽसु । च॒न्द्रमाः॑ऽइव । सोमः॑ । च॒मूषु॑ । ददृ॑शे । पिब॑ । इत् । अ॒स्य॒ । त्वम् । ई॒शि॒षे॒ ॥ ८.८२.८

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:82» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:2» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:8


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अप्सु चन्द्रमाः इव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः सोमः) = जो यह सोम है, वह (चमूषु) = शरीरस्थ द्यावापृथिवी, अर्थात् मस्तिष्क व शरीर में इस प्रकार (ददृशे) = दिखता है, (इव) = जैसे (अप्सु) = अन्तरिक्ष में (चन्द्रमाः) = चन्द्रमा दिखता है। अन्तरिक्ष चन्द्रमा से उज्ज्वल हो उठता है, इसी प्रकार सोम से वीर्य से मस्तिष्क व शरीर चमक उठते हैं। [२] हे प्रभो ! आप (अस्य) = इस सोम का (पिबा इत्) = पान करिये ही । (त्वं ईशिषे) = आप ही इसके पान के लिये ईश हैं। आपका स्मरण वासनाओं का विनाश करता है और इस प्रकार सोम का रक्षण होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर को इस प्रकार उज्ज्वल कर देता है, जैसे चन्द्रमा आकाश को ।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Drink of the soma which shines in the cups of yajna, in the beauty of human karma, and in the skies like the glory of the moon, drink freely since you alone rule over the nectar.