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इ॒षा म॑न्द॒स्वादु॒ तेऽरं॒ वरा॑य म॒न्यवे॑ । भुव॑त्त इन्द्र॒ शं हृ॒दे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

iṣā mandasvād u te raṁ varāya manyave | bhuvat ta indra śaṁ hṛde ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒षा । म॒न्द॒स्व॒ । आत् । ऊँ॒ इति॑ । ते । अर॑म् । वरा॑य । म॒न्यवे॑ । भुव॑त् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । शम् । हृ॒दे ॥ ८.८२.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:82» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:1» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे भगवन् ! (सद्योजुवः) तत्काल उपकारी (विश्वश्चन्द्राः) सबों के आनन्दप्रद (वाजाः) धन (अस्मभ्यं) हम लोगों को (ते) तू दे क्योंकि (वशैः+च) विविध कामनाओं से युक्त होकर ये मनुष्यगण (मक्षू) शीघ्रता के साथ (जरन्ते) स्तुति करते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर हम लोगों को वह धन दे, जिससे जगत् में उपकार आनन्द हो ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वराय मन्यवे

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इषा) = इस सोमरूप अन्न से (मन्दस्व) = आनन्द का अनुभव कर । (आत् उ) = अब शीघ्र ही यह सोमरूप अन्न (ते) = तेरे (वराय मन्यवे) = उत्कृष्ट ज्ञान के लिये (अरम्) = पर्याप्त होता है। सुरक्षित सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करने का साधन बन॑ता है। अथवा यह सोम (मन्यवे वराय अरम्) = क्रोध के निवारण के लिये पर्याप्त होता है। सोमरक्षक पुरुष कभी क्रोध का शिकार नहीं होता। [२] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! यह सोम (ते) = तेरे (हृदे) = हृदय के लिये (शं भुवत्) = शान्ति को देनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से [क] ज्ञानाग्नि दीप्त होती है, [ख] क्रोध शान्त होता है, में शान्ति होती है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! सद्योजुवः=सर्वोपकारिणः। विश्वश्चन्द्राः= सर्वानन्दप्रदाः। वाजाः=अन्यानि अस्मभ्यम्। ते=त्वया दातव्याः। यतः। वशैश्च=विविधैः कामैर्युक्ता वयम्। मक्षू=शीघ्रम्। त्वां जरन्ते=स्तुवन्ति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Be happy with the food, and then let it exhilarate you with the cherished fulfilment of your heart. Indra, O soul of this existential yajna, let there be peace at your heart unto the depth of your soul.