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आ प्र द्र॑व परा॒वतो॑ऽर्वा॒वत॑श्च वृत्रहन् । मध्व॒: प्रति॒ प्रभ॑र्मणि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā pra drava parāvato rvāvataś ca vṛtrahan | madhvaḥ prati prabharmaṇi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । प्र । द्र॒व॒ । प॒रा॒ऽवतः॑ । अ॒र्वा॒ऽवतः॑ । च॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । मध्वः॑ । प्रति॑ । प्रऽभ॑र्मणि ॥ ८.८२.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:82» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:1» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:1


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (उप+क्रमस्व) हे भगवन् ! सबके हृदय में विराजमान होओ (धृष्णो) हे निखिल विघ्नविनाशक ! (धृषता) परमोदार चित्त से (जनानाम्) मनुष्यों के हृदय को (आ+भर) पूर्ण कर, (अदाशूष्टरस्य) जो कभी दान प्रदान नहीं करता, उसके (वेदः) धन को छिन्न-भिन्न कर दे ॥७॥
भावार्थभाषाः - धनसम्पन्न रहने पर भी जो असमर्थों को नहीं देता, उसका धन नष्ट हो जाय ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परावतः+अर्वावतः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वृत्रहन्) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले प्रभो! आप (परावतः) = सुदूर फल के हेतु से, अर्थात् परलोक में निःश्रेयस की प्राप्ति के हेतु से (त्र) = तथा (अर्वावतः) = समीप फल के हेतु से, अर्थात् इहलोक में अभ्युदय की प्राप्ति के हेतु से (आ प्रद्रव) = हमें सर्वतः प्राप्त होइये। आपने ही हमें अभ्युदय व निःश्रेयस को प्राप्त कराना है। [२] हे प्रभो ! (मध्वः) = सब ओषधियों के सारभूत व जीवन को मधुर बनानेवाले सोम के (प्रति प्रभर्मणि) = प्रतिदिन धारण के निमित्त आप हमें प्राप्त होइये। आपकी उपासना ही हमें वासनाओं से बचाकर इस सोम के रक्षण के योग्य बनायेगी।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभुस्तवन हमें वासनाओं से बचाकर अभ्युदय व निःश्रेयस को प्राप्त कराता है तथा सोम के रक्षण के योग्य करता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! उप+क्रमस्व=सर्वत्र विराजस्व। हे धृष्णो=विघ्नविनाशक ! धृषतः=परमोदारेण चेतसा। जनानाम्=चेतांसि आभर। अदाशूष्टरस्य=अत्यन्तम्= अत्यन्तमदातृतमस्य। वेदो धनं सं हरेति शेषः ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O destroyer of darkness, evil and ignorance, come rushing without delay, whether you are far or near, and join us in this vibrant yajnic economy of the divine order. (O man in search of the soul, rush in from roaming around and join the living systemic world within at the vibrant centre.)