न॒ह्य१॒॑न्यं ब॒ळाक॑रं मर्डि॒तारं॑ शतक्रतो । त्वं न॑ इन्द्र मृळय ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
nahy anyam baḻākaram marḍitāraṁ śatakrato | tvaṁ na indra mṛḻaya ||
पद पाठ
न॒हि । अ॒न्यम् । ब॒ला । अक॑रम् । म॒र्डि॒तार॑म् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । त्वम् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । मृ॒ळ॒य॒ ॥ ८.८०.१
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:80» मन्त्र:1
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:35» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:1
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वप्रिय देव ! ध्यान के द्वारा (हृदे) हृदय में धारित तू (नः) हम लोगों का (शं) कल्याणकारी (भव) हो (नः) हम लोगों का तू (सुशेवः) सुखकारी है। (मृळयाकुः) आनन्ददायी का (अदृप्तक्रतुः) शान्तकर्मा और (अवातः) वायु आदि से रहित है ॥७॥
भावार्थभाषाः - जब उपासना द्वारा परमात्मा हृदय में विराजमान होता है, तब ही वह सुखकारी होता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'अद्वितीय सुखदाता' प्रभु
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शतक्रतो) = अनन्त शक्ति व प्रज्ञानवाले प्रभो ! मैं (वट्) = सचमुच (अन्यम्) = आपसे भिन्न किसी और को (मर्डितारम्) = मेरे जीवन को सुखी करनेवाला (नहि आकरम्) = नहीं करता हूँ। आपको ही मैं सुख प्राप्त करानेवाला जानता हूँ। [२] हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (नः) = हमें (मृडय) = सुखी करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु पर पूर्ण आस्था रखें। प्रभु ही हमें जीवन में सुखी करनेवाले हैं।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! त्वं ध्यानेन। हृदे=हृदये धारितः सन्। शं=कल्याणकारी। नः=अस्माकं भव। नः=अस्माकम्। सुशेवः=परमसुखकारी। मृळयाकुः=आनन्दकारी। अदृप्तक्रतुः=शान्तिकर्मा। पुनः। अवातः=बाह्यवायुरहितः ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - True it is, O lord of infinite good action, Indra, I have never seen, never accepted, anyone else more beneficent, more munificent, than you. O lord, we pray, be kind and bless us with peace.
