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आ नो॑ गन्तं मयो॒भुवाश्वि॑ना श॒म्भुवा॑ यु॒वम् । यो वां॑ विपन्यू धी॒तिभि॑र्गी॒र्भिर्व॒त्सो अवी॑वृधत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā no gantam mayobhuvāśvinā śambhuvā yuvam | yo vāṁ vipanyū dhītibhir gīrbhir vatso avīvṛdhat ||

पद पाठ

आ । नः॒ । ग॒न्त॒म् । म॒यः॒ऽभुवा॑ । अश्वि॑ना । श॒म्ऽभुवा॑ । यु॒वम् । यः । वा॒म् । वि॒प॒न्यू॒ इति॑ । धी॒तिऽभिः॑ । गीः॒ऽभिः । व॒त्सः । अवी॑वृधत् ॥ ८.८.१९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:8» मन्त्र:19 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:19


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शिव शंकर शर्मा

राजकर्त्तव्य का उपदेश देते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे प्रजाहितचिन्तक राजा और सचिव ! आप दोनों (मयोभुवा) सुखकारी और (शंभुवा) कल्याणकारी हैं, अतः (युवम्) आप दोनों (नः) हमारे निकट सुख-दुःख श्रवण करने को सदा (आ+गन्तम्) आया करें (यः+वत्सः) जो प्रियपुत्रवत् लालनीय पालनीय जन है, वह (विपन्यू) हे स्तवनीय राजा अमात्य ! (धीतिभिः) सेवाओं से तथा (गीर्भिः) स्तुतियों से (वाम्) आपके सुयश को (अवीवृधत्) बढ़ाता है, उसकी भी नाना उपायों से रक्षा कीजिये ॥१९॥
भावार्थभाषाः - अमात्यवर्गों के साथ राजा सदा प्रजाओं का हितचिन्तन करे। वैद्यों को ग्राम-२ में रखकर रोगों को दूर करावे और इतिहासलेखक आदि विद्वानों को सर्वोपायों से पाले ॥१९॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मयोभुवा) हे सुखोत्पादक (शम्भुवा) शान्त्युत्पादक (अश्विना) बल द्वारा सर्वत्र विद्यमान के समान ! (नः) हमारे समीप (आगन्तम्) आवें (विपन्यू) हे व्यवहारकुशल ! (यः, वत्सः) जो वत्ससदृश पालनीय हम लोग (धीतिभिः) कर्मों द्वारा और (गीर्भिः) वेदवाणियों द्वारा (वाम्) आपको (अवीवृधत्) बढ़ाते हैं ॥१९॥
भावार्थभाषाः - हे शान्ति तथा सुखोत्पादक सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त हों, हम लोग आपकी वृद्ध्यर्थ वेदवाणियों द्वारा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं ॥१९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मयोभुवा-शम्भुवा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मयोभुवा) = [मयस :- सुखस्य भावयितारौ ] सुख के उत्पन्न करनेवाले (अश्विना) = प्राणापानो ! (नः) = हमें (आगन्तम्) = प्राप्त होइये। (युवम्) = आप (शम्भुवा) = सब रोगों के शमन को उत्पन्न करनेवाले हो । [२] हे (विपन्यू) = विशेषरूप से स्तुति के योग्य प्राणापानो ! (यः) = जो (वत्सः) = वेदवाणियों का उच्चारण करनेवाला यह ज्ञानी पुरुष है, वह (धीतिभिः) = उत्तम यज्ञादि क्रियाओं से तथा (गीर्भिः) = ज्ञान की वाणियों से (वां अवीवृधत्) = आपका वर्धन करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधक को चाहिये कि यह यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहे, स्वाध्याय को अपनाये [ धीतिभिः, गीर्भिः] । इस प्रकार प्राण उसे सुखी व नीरोग बनायेंगे।
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शिव शंकर शर्मा

राजकर्त्तव्यमुपदिशति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना=अश्विनौ=राजसचिवौ ! मयोभुवा= मयसः=सुखस्य भावयितारौ। यद्वा। मयः कल्याणं भवत्याभ्यामिति मयौभुवौ। पुनः। शंभुवा=रोगाणां शमस्य भावयितारौ। युवम=युवाम्। नोऽस्मान्। आगन्तमागच्छतम्। हे विपन्यू ! विशेषेण पनितव्यौ=स्तुत्यौ। पन व्यवहारे स्तुतौ च। यो वत्सः=यः प्रियपुत्रवत् पालनीयो जनः। धीतिभिः=कर्मभिः परिचरणैः। गीर्भिः=स्तुतिभिश्च। वाम्=युवाम्। अवीवृधत्=वर्धयति स्तौति। तं प्रत्यपि आगच्छतम् ॥१९॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मयोभुवा) हे सुखस्योत्पादकौ (शंभुवा) शान्त्युत्पादकौ (अश्विना) बलेन व्यापकौ ! (नः) अस्मान् (आगन्तम्) आगच्छतम् (विपन्यू) हे विशेषेण व्यवहारकुशलौ ! (यः, वत्सः) यस्ते परिपाल्यः (धीतिभिः) कर्मभिः (गीर्भिः) वेदवाग्भिर्वा (वाम्) युवाम् (अवीवृधत्) वर्धये ॥१९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of peace, pleasure and well being in prosperity, lovers and admirers of joyous programmes, come both of you to us who, your darling celebrants, exalt you with our words, thoughts and actions.