वांछित मन्त्र चुनें
380 बार पढ़ा गया

अत॑: स॒हस्र॑निर्णिजा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना । व॒त्सो वां॒ मधु॑म॒द्वचोऽशं॑सीत्का॒व्यः क॒विः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ataḥ sahasranirṇijā rathenā yātam aśvinā | vatso vām madhumad vaco śaṁsīt kāvyaḥ kaviḥ ||

पद पाठ

अतः॑ । स॒हस्र॑ऽनिर्निजा । रथे॑न । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । व॒त्सः । वा॒म् । मधु॑ऽमत् । वचः॑ । अशं॑सीत् । का॒व्यः । क॒विः ॥ ८.८.११

380 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:8» मन्त्र:11 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:27» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:11


शिव शंकर शर्मा

फिर उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अतः) इस कारण हे (अश्विना) राजा और अमात्यो ! आप दोनों (सहस्रनिर्णिजा) सहस्रों अलङ्कारों से भूषित (रथेन) रथ से (आ+यातम्) हम लोगों की रक्षा के लिये आवें। हे अश्विद्वय ! (काव्यः) काव्यशास्त्रों में निपुण (कविः) कवि=विशेषद्रष्टा (वत्सः) गोवत्सवत् पालनीय जन (वाम्) आपके सम्बन्ध में (मधुम१त्+वचः) मधुर वचन उच्चारण कर रहा है ॥११॥
भावार्थभाषाः - राजा वहाँ-२ बड़े समारोह के साथ जाय और सदाचारों को पालता हुआ वैसा विचरण करे, जिससे सर्वत्र प्रजा प्रशंसा करे ॥११॥
टिप्पणी: १−मधुमत् वचन−वे ही प्रजापालक वास्तव में राजा और मन्त्री हैं, जिनके सम्बन्ध में प्रजा सदा शुभाषिणी होती है ॥११॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अतः) इस हेतु (अश्विना) हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! (सहस्रनिर्णिजा) अनेक रूपोंवाले (रथेन) रथद्वारा (आयातम्) आप आएँ (वत्सः) आपका वत्स (काव्यः) कविपुत्र (कविः) स्वयं भी कवि यह उपासक (वाम्) आपकी स्तुतिसम्बन्धी (मधुमद्वचः) मधुरवाणियों को (अशंसीत्) कर रहा है ॥११॥
भावार्थभाषाः - हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप अपने विचित्र यान द्वारा हमारे यज्ञ को प्राप्त हों, सब विद्वान् पुरुष मधुर वाणियों द्वारा आपका स्तवन कर रहे हैं ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

माधुर्ययुक्त वचन का शंसन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अतः) = गत मन्त्र के अनुसार इस प्राणसाधना से सब अभिलषित पूर्ण होते हैं, (सहस्त्रनिर्णिजा) = हजारों प्रकार से शुद्ध बने इस (रथेन) = शरीर-रथ से (आयातम्) = आप हमें प्राप्त होवो। [२] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (वत्सः) = ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करनेवाला (काव्यम्) = [काव्यं अस्त्र अस्त्रि] प्रभु के अजरामर वेद काव्य को अपनानेवाला (कविः) = क्रान्तप्रज्ञ स्तोता (वाम्) = आपके (प्रति मधुमत् वचः) = माधुर्ययुक्त वचन का (अशंसीत्) = शासन करता है। वस्तुतः प्राणसाधना करनेवाला कटुवचनों का कभी प्रयोग नहीं करता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से शरीर रथ सब प्रकार से परिशुद्ध बनता है। ज्ञान वृद्धि व वाणी का माधुर्य प्राप्त होता है।

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमेवार्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - अतोऽस्मात् कारणात्। हे अश्विना=राजामात्यौ ! सहस्रनिर्णिजा=सहस्रालङ्कारैर्भूषितेन। रथेन। अस्मानायातमागच्छतम्। हे अश्विनौ ! वाम्=युवयोः सम्बन्धे। काव्यः=काव्येषु निपुणः। कविर्विशेषद्रष्टा वत्सो युवयोः पुत्रभूतो जनः। मधुमद्=माधुर्य्योपेतं वचो वचनम्। अशंसीत्=शंसति ब्रवीति ॥११॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अतः) अतः कारणात् (सहस्रनिर्णिजा) बहुविधरूपेण (रथेन) यानेन (अश्विना) हे अश्विनौ ! (आयातम्) आगच्छतम् (वत्सः) तव वत्सः (काव्यः) विद्वत्पुत्रः (कविः) स्वयमपि विद्वानुपासकः (वाम्) युवयोः (मधुमद्वचः) मधुरवाचम् (अशंसीत्) ब्रूते ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For this reason, Ashvins, come by the chariot bearing a thousand beauties of wealth and divine bliss. The poet’s poet, a darling admirer of yours, adores and glorifies you with honey sweets of his sacred words.