वि॒दद्यत्पू॒र्व्यं न॒ष्टमुदी॑मृता॒युमी॑रयत् । प्रेमायु॑स्तारी॒दती॑र्णम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
vidad yat pūrvyaṁ naṣṭam ud īm ṛtāyum īrayat | prem āyus tārīd atīrṇam ||
पद पाठ
वि॒दत् । यत् । पू॒र्व्यम् । न॒ष्टम् । उत् । ई॒म् । ऋ॒त॒ऽयुम् । ई॒र॒य॒त् । प्र । ई॒म् । आयुः॑ । ता॒री॒त् । अती॑र्णम् ॥ ८.७९.६
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:79» मन्त्र:6
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:34» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:6
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वप्रिय देव ! (त्वं) तू साधुओं को (अन्यकृतेभ्यः+द्वेषोभ्यः) अन्य दुष्ट पुरुषों की दुष्टता और अपकार आदि से बचाकर (उरु) बहुत (वरूथं) श्रेष्ठ रक्षण (यन्तासि) देता है। (तनूकृद्भ्यः) जो शरीर और मन को दुर्बल बनाते हैं, उनसे आप रक्षा करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा की आज्ञा पर चलते हैं, वे ईर्ष्या, द्वेष आदियों से स्वयं रहित हो जाते हैं, इसलिये उनकी भी कोई निन्दा नहीं करता। इस प्रकार परमात्मा सज्जनों को दुष्टता से बचाते रहते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ज्ञान + यज्ञ = शान्त दीर्घजीवन
पदार्थान्वयभाषाः - (यद्) = जब (पूर्व्यम्) = जीवन के पूर्व काल में - ब्रह्मचर्याश्रम में होनेवाले ज्ञानरूप धन को (विदद्) = प्राप्त करता है, और (ईम्) = निश्चय से (नष्टम्) = अदृष्ट- सामान्यतः न दिखनेवाली (ऋतायुम्) = यज्ञ की कामना को (ईं उद् ईरयत्) = निश्चय से अपने में प्रेरित करता है। तो (ईम्) = निश्चय से (अतीर्णम्) = काम- क्रोध आदि शत्रुओं से अनाक्रान्त (आयु:) = जीवन को (प्रतारीत्) = बढ़ाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञान को प्राप्त करें-यज्ञशील बनें। यही काम-क्रोध आदि से अनाक्रान्त दीर्घजीवन को प्राप्त करने का मार्ग है।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम=हे सर्वप्रिय जगदीश ! त्वं=साधून्। तनूकृद्भ्यः=तनूनां विच्छेदकेभ्यः। अन्यकृतेभ्यः। द्वेषोभ्यः=द्वेषेभ्यः। वरूथम्=वरणीयम्। उरु=विस्तीर्णं= रक्षणम्। यन्तासि=ददासि ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - By the grace of Soma, the devotee recovers what he lost earlier, the lord exhorts and exalts the yajnic performer and observer of the law of truth, and he increases, strengthens and fulfils the life which the celebrant has yet to live.
