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अ॒र्थिनो॒ यन्ति॒ चेदर्थं॒ गच्छा॒निद्द॒दुषो॑ रा॒तिम् । व॒वृ॒ज्युस्तृष्य॑त॒: काम॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

arthino yanti ced arthaṁ gacchān id daduṣo rātim | vavṛjyus tṛṣyataḥ kāmam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒र्थिनः॑ । यन्ति॑ । च॒ । इत् । अर्थ॑म् । गच्छा॑न् । इत् । द॒दुषः॑ । रा॒तिम् । व॒वृ॒ज्युः । तृष्य॑तः । काम॑म् ॥ ८.७९.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:79» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:33» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (यन्नग्नं) जो नग्न है, उसको वह परमात्मा (अभ्यूर्णोति) वस्त्र से ढाँकता है (यत्+विश्वम्+तुरम्) जो सब रोगग्रस्त है, उसकी (भिषक्ति) चिकित्सा करता है, (अन्धः) नेत्रहीन (प्र+ख्यत्+ईम्) अच्छी तरह से देखता है। (श्रोणः) पङ्गु (निः+भूत्) चलने लगता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की अचिन्त्य शक्ति है, इस कारण विपरीत बातें भी होती हैं, इसमें आश्चर्य्य करना नहीं चाहिये ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धनप्राप्ति व दान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अर्थिनः) = प्रार्थना करनेवाले-'वयं स्याम पतयो रयीणाम्' का जप करनेवाले (चेत्) = यदि प्रभु की कृपा से (अर्थं यन्ति) = धन को प्राप्त करते हैं। तो (इत्) = निश्चय से वे (ददुषः) = दानशील पुरुष के (रातिम्) = दान के भाव को भी (गच्छान्) = प्राप्त करें। धन प्राप्त होने पर दानशील बनें। [२] अब ये अर्थी धनी बनकर (तृष्यतः) = प्यासे की (कामम्) = अभिलाषा को (ववृज्युः) = पूर्ण करें । उसकी धन की प्यास को धनदान द्वारा बुझानेवाले हों। अथवा प्यासे की कामना को छोड़नेवाले हों, अर्थात् सतत धन के लोभ में ही न पड़े रहें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभुकृपा से धन को प्राप्त करें तो दान की वृत्ति को भी प्राप्त करें। खूब दान देनेवाले बनें, धन के लोभ में न पड़ें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अयं परेशः यन्नग्नं तद् अभ्यूर्णोति=वस्त्रेण आच्छादयति। यत्=विश्वं=सर्वम्। तुरम्=रोगग्रस्तमस्ति। तद् भिषक्ति। तस्य कृपया। अन्धः=नेत्रविकलः। प्र+ख्यत्=पश्यति। श्रोणः=पङ्गुरपि। निर्भूत्=निर्भवति=निर्गच्छति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - By the grace and munificence of Soma, the seekers obtain their object of desire, the needy receive the gift of the giver, the thirsty satisfy their thirst with fulfilment.