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स म॒न्युं मर्त्या॑ना॒मद॑ब्धो॒ नि चि॑कीषते । पु॒रा नि॒दश्चि॑कीषते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa manyum martyānām adabdho ni cikīṣate | purā nidaś cikīṣate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । म॒न्युम् । मर्त्या॑नाम् । अद॑ब्धः । नि । चि॒की॒ष॒ते॒ । पु॒रा । नि॒दः । चि॒की॒ष॒ते॒ ॥ ८.७८.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:78» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:32» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:6


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) और (धृष्णो) हे दुष्टधर्षक हे शिष्टग्राहक देव ! (त्वम्+हि) तू ही परमोदार (शृण्विषे) सुना जाता है, अतः (वसो) हे सबको वास देनेवाले ईश ! (नः) हम प्राणियों और मनुष्यजातियों को (कर्णशोभना) कानों देहों और मनों को शोभा पहुँचानेवाले (पुरूणि) बहुत से आभरण और साधन (आभर) दो ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो ईश सबको वास देता है और प्राणियों पर दया रखता है, वही प्रार्थनीय है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रोध का पराभव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः अदब्धः) = वे किसी से हिंसित न होनेवाले प्रभु (मर्त्यानाम्) = मनुष्यों के (मन्युम्) = क्रोध को (निचिकीषते) = [निकरोति] निरादृत करते हैं- पराभूत करते हैं। प्रभु का स्मरण करने पर यह उपासक क्रोधशून्यवृत्तिवाला बनता है। [२] (निदः पुरा) = निन्दनीय स्थिति में पहुँचने से पूर्व ही प्रभु इनके क्रोध को (चिकीषते) = निकृत करते हैं। क्रोध के कारण मनुष्य उपहास्य व निन्द्य स्थिति में पहुँच जाता है। प्रभु अपने उपासक को इस स्थिति में कभी नहीं पहुँचने देते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु अपने उपासक को क्रोध पर विजयी बनाते हैं। उपासना क्रोध को दूर करती है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - उत=अपि च ! हे धृष्णो ! हे दुष्टधर्षक ! हे शिष्टग्राहक देव ! त्वं+हि=त्वमेव खलु। उदारतमः। शृण्विषे=श्रूयसे। हे वसो=हे वासयितः ईश ! अतः नोऽस्मभ्यम्। कर्णशोभना=कर्णशोभनानि=कर्णाभरणानि। पुरूणि=बहूनि। आभर=आहर=देहीत्यर्थः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Undaunted and invincible, he watches the pride and passion of mortals, watches and humbles them before they can malign him.