उ॒त न॑: कर्ण॒शोभ॑ना पु॒रूणि॑ धृष्ण॒वा भ॑र । त्वं हि शृ॑ण्वि॒षे व॑सो ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
uta naḥ karṇaśobhanā purūṇi dhṛṣṇav ā bhara | tvaṁ hi śṛṇviṣe vaso ||
पद पाठ
उ॒त । नः॒ । क॒र्ण॒ऽशोभ॑ना । पु॒रूणि॑ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । आ । भ॒र॒ । त्वम् । हि । शृ॒ण्वि॒षे । व॒सो॒ इति॑ ॥ ८.७८.३
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:78» मन्त्र:3
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:31» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:3
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् महाराज ! (ते+धनुः) तुम्हारा धनुष् (तुविक्षम्) बाणों को बहुत दूर फेंकनेवाला (सुकृतम्) सुविरचित और (सुमयम्) सुखकारी है। (बुन्दः) तुम्हारा बाण (साधुः) उपकारी और (हिरण्ययः) सुर्वणमय और दुःखहारी है। (ते+उभा) तुम्हारे दोनों (बाहू) हाथ (रण्या) रमणीय (सुसंस्कृता) सुसंस्कृत (ऋदुपे) सम्पत्तिरक्षक और (ऋदुवृधा) सम्पत्तिवर्धक हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - राज्याधीश के सर्व आयुध प्रजारक्षक हों और शरीर मन और धन उनके ही हितकारी हों। अर्थात् राजा कभी स्वार्थी भोगविलासी और आलसी न हो ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
कर्णशोभना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (धृष्णो) = शत्रुओं का धर्षण करनेवाले प्रभो! आप (नः) = हमारे लिये (उत) = निश्चय से (पुरूणि) = खूब पालन व पूरण करनेवाले (कर्णशोभना) = कानों के लिये शोभा के कारणभूत ज्ञानों को (आभर) = प्राप्त कराइये। ये ज्ञान के वचन ही हमारे कानों के लिये शोभा के वर्धक हों। [२] हे (वसो) = ज्ञान को देकर हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (हि) = ही (शृण्विषे) = हमारे से सुने जाते हैं। हमारे लिये ज्ञानों को देनेवाले आप ही हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञान के वचनों को सुनें। ये ज्ञानवाणियाँ ही हमारे कानों के आभरण हों।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! ते=तव। धनुः। तुविक्षम्= बहुविक्षेपम्=महाविक्षेपम्। सुकृतम्=सुष्ठु विरचितम्। सुमयम्=सुसुखम्। तव बुन्दः=इषुः। साधुः। हिरण्ययः=सुवर्णमयः। ते=तव। उभा=उभौ बाहू। रण्या=रमणीयौ। सुसंस्कृतौ। ऋदुपे=अर्दनपातिनौ चित्। ऋदुवृधा=सम्पद्वर्धिनौ ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Lord of life, giver of peace and settlement, potent and invincible, bring us manifold gifts of life, sweet to the ear, blissful. We hear you alone are the lord of wealth, honour and beauty.
