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अ॒भि ग॑न्ध॒र्वम॑तृणदबु॒ध्नेषु॒ रज॒स्स्वा । इन्द्रो॑ ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्वृ॒धे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi gandharvam atṛṇad abudhneṣu rajassv ā | indro brahmabhya id vṛdhe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । ग॒न्ध॒र्वम् । अ॒तृ॒ण॒त् । अ॒बु॒ध्नेषु॑ । रजः॑ऽसु । आ । इन्द्रः॑ । ब्र॒ह्मऽभ्यः॑ । इत् । वृ॒धे ॥ ८.७७.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:77» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:29» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (आद्+ईम्) तदनन्तर इन्द्र से जिज्ञासिता (शवसी) वह बलवती सभा (अब्रवीत्) इस प्रकार उत्तर करे (पुत्र) हे पुत्र राजन् ! (और्णवाभम्) उर्णनाभ के समान मायाजाल फैलानेवाला और (अहीशुवम्) सर्पवत् कुटिलगामी ये दो प्रकार के मनुष्य जगत् के शत्रु हैं, इनको आप अच्छे प्रकार जानें। अन्य भी जगद्द्वेषी बहुत से हैं, हे पुत्र ! (ते) वे सब तेरे (निष्टुरः) शासनीय (सन्तु) होवें ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा को उचित है कि प्रजा में उपद्रवकारी जनों को सदा निरीक्षण में रक्खे और उन्हें सुशिक्षित बनावे ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभि गन्धर्वम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = यह जितेन्द्रिय पुरुष (गन्धर्वं अभि) = वेदवाणी के धारण करनेवाले प्रभु की ओर चलता है (अबुध्नेषु) = पदविधान के अयोग्य (रजः सु) = लोकों में, अर्थात् हृदयान्तरिक्ष में (अतृणत्) = यह वासनाओं का विनाश करता है। इसके हृदय में वासनाएँ अपना पैर नहीं जमा पातीं। इन वासनाओं के लिये इसका हृदय 'अबुध्न' बना रहता है। [२] यह इन्द्र वासनाओं का विनाश करके (इत्) = निश्चय से (ब्रह्मभ्यः वृधे) = ज्ञानों के वर्धन के लिये होता है। वासनाविनाश के बिना ज्ञान वृद्धि का सम्भव है ही नहीं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - एक जितेन्द्रिय पुरुष प्रभु की ओर चलता है और हृदयस्थली से वासनाओं के झाड़ी-झंकाड़ों को उखाड़ फेंकता है। यह अपने जीवन में उत्तमोत्तम ज्ञान की वृद्धि को करता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - आद्+ईम्=तदनन्तरम्। इन्द्रेण जिज्ञासिता। शवसी= बलवती सा सभा। इदमब्रवीत्=ब्रूयात्। हे पुत्र ! और्णवाभम्=उर्णनाभवन्मायाजालविस्तारकम्। तथा अहीशुवम्=सर्पवत् कुटिलगामिनं द्विविद्यौ पुरुषौ जगतः शत्रू विजानीहि। अन्येऽपि जगद्द्वेषिणो बहवः सन्ति। हे पुत्र ! ते=सर्वे। ते=तव। निष्टुरः=शासनीयाः सन्तु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the advancement of the holy and intelligent people, Indra scatters the selfish forces living purely for physical and material values on stupid and baseless planes of existence.