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आदीं॑ शव॒स्य॑ब्रवीदौर्णवा॒भम॑ही॒शुव॑म् । ते पु॑त्र सन्तु नि॒ष्टुर॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ād īṁ śavasy abravīd aurṇavābham ahīśuvam | te putra santu niṣṭuraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आत् । ई॒म् । श॒व॒सी । अ॒ब्र॒वी॒त् । औ॒र्ण॒ऽवा॒भम् । अ॒ही॒शुव॑म् । ते । पु॒त्र॒ । स॒न्तु॒ । निः॒ऽतुरः॑ ॥ ८.७७.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:77» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:29» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उस अर्थ को विस्पष्ट करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमेश्वर ! (यद्) जब-जब तू (दस्युहा+अभवः) इस संसार के चोर, डाकू महामारी, प्लेग आदि निखिल विघ्नों का विनाश करता है, तब तू (उभे+रोदसी) ये दोनों द्युलोक और पृथिवीलोक (क्रक्षमाणम्+त्वा) तुझ रक्षक की कीर्ति को (अनु+अकृपेताम्) क्रमपूर्वक गावें ॥११॥
भावार्थभाषाः - जब-जब मनुष्य के ऊपर आपत्तियाँ आकर डरा जाएँ, तब-तब उसको प्रत्येक नरनारी धन्यवाद दे, उसकी कीर्ति गावे और परस्पर साहाय्य कर ईश्वर को समर्पण करे ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

और्णवाभम् अहीशुवम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] इस प्रकार प्रश्न के होने पर (आत् ईम्) = अब निश्चय से (शवसी) = शक्तिसम्पन्न गतिशील माता (अब्रवीत्) = कहती है कि (और्णवाभम्) = मकड़ी [ऊर्णनाभि ] की तरह अपने जाल को फैलानेवाले (अहीशुभम्) = [अहि श्वि] सर्प की तरह [ आहन्ति इति] गतिवाले व निरन्तर अपने (विष) = प्रभाव को बढ़ानेवाले [ श्वि गतिवृद्ध्योः] 'काम' को ही तू अपना उग्रतम शत्रु जान। [२] हे (पुत्र) = अपने जीवन को पवित्र व सुरक्षित [पु+त्रा, पुनाति त्रायते] बनानेवाले प्रिय पुत्र ! ये काम आदि शत्रु ही (ते) = तेरे (निष्टुरः सन्तु) = निस्तारणीय हों। इन शत्रुओं को तू सदा समाप्त करनेवाला बन। इनके वशीभूत तूने नहीं होना।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - माता बालक को इस प्रकार प्रेरणा देती है कि तूने वासनाजाल को विनष्ट करनेवाला बनना है ।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थं विस्पष्टयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! यद्=यदा त्वम्। दस्युहा= समस्तचोरादिविघ्नविनाशकः। अभवः=भवसि। तदा। उभे+रोदसी=द्यावापृथिव्यौ। क्रक्षमाणम्=रक्षयन्तं त्वा। अन्वकृपेताम्=गायेताम् ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let the mother power that makes him rise to the office of Indra, she having the full power to create, advise and decide say: O son, ruler and protector of the state of humanity, one is the demonic spider-like weaver of sinister devouring plots, the other is the serpentine master of crookedness and sabotage, which two you should counter and eliminate.