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तु॒वि॒क्षं ते॒ सुकृ॑तं सू॒मयं॒ धनु॑: सा॒धुर्बु॒न्दो हि॑र॒ण्यय॑: । उ॒भा ते॑ बा॒हू रण्या॒ सुसं॑स्कृत ऋदू॒पे चि॑दृदू॒वृधा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tuvikṣaṁ te sukṛtaṁ sūmayaṁ dhanuḥ sādhur bundo hiraṇyayaḥ | ubhā te bāhū raṇyā susaṁskṛta ṛdūpe cid ṛdūvṛdhā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तु॒वि॒ऽक्षम् । ते॒ । सुऽकृ॑तम् । सु॒ऽमय॑म् । धनुः॑ । सा॒धुः । बु॒न्दः । हि॒र॒ण्ययः॑ । उ॒भा । ते॒ । बा॒हू इति॑ । रण्या॑ । सुऽसं॑स्कृता । ऋ॒दु॒ऽपे । चि॒त् । ऋ॒दु॒ऽवृधा॑ ॥ ८.७७.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:77» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:30» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:11


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभुष्ठिर) हे पर्वतवत् स्थिर ! हे भयङ्कर युद्धों और आपत्तियों में अचल राजन् ! (सद्यः) तत्काल ही (जातः) परमोत्साही होकर (तेन) उस आयुध की सहायता से (स्तोतृभ्यः) धर्मपरायण स्तुतिपाठक (नृभ्यः) पुरुषजातियों और (नारिभ्यः) स्त्रीजातियों के (अत्तवे) भोग के लिये पर्य्याप्त अन्न (आभर) लाइये ॥८॥
भावार्थभाषाः - जब-जब दुर्भिक्ष आदि आपत्ति आवे, तब-तब राजा उसके निवारण का पूरा प्रबन्ध करे ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धनुः, बुन्दः व बाहू

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते धनुः) = हे इन्द्र ! तेरा धनुष (तुविक्षम्) = शत्रुओं का महान् क्षय करनेवाला है, (सुकृतम्) = शोभन कर्मोंवाला व (शभयम्) = उत्तम सुख को देनेवाला है। वस्तुतः 'प्रणवो धनुः' प्रभु का नाम ही धनुष है। यह प्रभु नामस्मरण शत्रुओं का विनाशक, शुभ का उत्पादक तथा सुखद है। (बुन्दः) = बाण [इषु] (साधुः) = सब कार्यों को सिद्ध करनेवाला व (हिरण्ययः) = ज्योतिर्मय है। आत्मा ही बाण है- यह साधु व हिरण्य बना है। [२] हे इन्द्र ! (ते) = तेरी (उभा बाहू) = दोनों भुजाएँ (रण्या) = रमणीय वरण के लिये उत्तम हैं, (सुसंस्कृते) = ये भुजाएँ पूर्णरूप से परिष्कृत हैं। (ऋदूपे) = सब पीड़कों को दूर फेंकनेवाली हैं तथा (चित्) = निश्चय से (ऋदूवृधा) = इन पीड़क शत्रुओं को विद्ध करनेवाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रणवरूप धनुष को हम ग्रहण करें। यह शत्रुओं का क्षय करनेवाला, शुभ कर्मोंवाला व सुख को देनेवाला है। हम आत्मरूप बाण को उत्तम कार्यों का साधक व ज्योतिर्मय बनायें। हमारी भुजाएँ संग्राम में उत्तम व शत्रुओं को परे फेंकनेवाली व उन्हें विद्ध करनेवाली हों। अगले सूक्त का ऋषि भी 'कुरुसुति काण्व' ही है-
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ऋभुष्ठिर=हे ऋभुवत्=पर्वतवत् स्थिर हे अचल युद्धेष्वपि ! सद्यः=तदानीमेव। जातः=परमोत्साही भूत्वा। तेन=आयुधसाहाय्येन। स्तोतृभ्यः=धर्मपरायणेभ्यः। नृभ्यः=मनुष्येभ्यः। नारिभ्यः=स्त्रीभ्यश्च। अत्तवे=भोगाय। बहुधनम्। आभर ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Mighty is your bow, shooting far your arrow, well doing and protecting peace and well being. Safe and secure is your defence, golden gracious. Both your arms, internal security and external defence, are fully trained and civilised, they protect property, safeguard truth and law, and advance culture and refinement.