पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते धनुः) = हे इन्द्र ! तेरा धनुष (तुविक्षम्) = शत्रुओं का महान् क्षय करनेवाला है, (सुकृतम्) = शोभन कर्मोंवाला व (शभयम्) = उत्तम सुख को देनेवाला है। वस्तुतः 'प्रणवो धनुः' प्रभु का नाम ही धनुष है। यह प्रभु नामस्मरण शत्रुओं का विनाशक, शुभ का उत्पादक तथा सुखद है। (बुन्दः) = बाण [इषु] (साधुः) = सब कार्यों को सिद्ध करनेवाला व (हिरण्ययः) = ज्योतिर्मय है। आत्मा ही बाण है- यह साधु व हिरण्य बना है। [२] हे इन्द्र ! (ते) = तेरी (उभा बाहू) = दोनों भुजाएँ (रण्या) = रमणीय वरण के लिये उत्तम हैं, (सुसंस्कृते) = ये भुजाएँ पूर्णरूप से परिष्कृत हैं। (ऋदूपे) = सब पीड़कों को दूर फेंकनेवाली हैं तथा (चित्) = निश्चय से (ऋदूवृधा) = इन पीड़क शत्रुओं को विद्ध करनेवाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रणवरूप धनुष को हम ग्रहण करें। यह शत्रुओं का क्षय करनेवाला, शुभ कर्मोंवाला व सुख को देनेवाला है। हम आत्मरूप बाण को उत्तम कार्यों का साधक व ज्योतिर्मय बनायें। हमारी भुजाएँ संग्राम में उत्तम व शत्रुओं को परे फेंकनेवाली व उन्हें विद्ध करनेवाली हों। अगले सूक्त का ऋषि भी 'कुरुसुति काण्व' ही है-