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पिबेदि॑न्द्र म॒रुत्स॑खा सु॒तं सोमं॒ दिवि॑ष्टिषु । वज्रं॒ शिशा॑न॒ ओज॑सा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pibed indra marutsakhā sutaṁ somaṁ diviṣṭiṣu | vajraṁ śiśāna ojasā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पिब॑ । इत् । इ॒न्द्र॒ । म॒रुत्ऽस॑खा । सु॒तम् । सोम॑म् । दिवि॑ष्टिषु । वज्र॑म् । शिशा॑नः । ओज॑सा ॥ ८.७६.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे कविगण ! (अस्य+सोमस्य+पीतये) इस जगत् की रक्षा के लिये (मरुत्वन्तम्) प्राणों के सहायक (इन्द्रम्) परमेश्वर की (प्रत्नेन+मन्मना) वेदरूप प्राचीन स्तोत्र से यद्वा पूर्ण स्तव से (हवामहे) स्तुति प्रार्थना और आवाहन करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - सोम=संसार=“षूङ् प्राणिगर्भविमोचने” ईश्वर इस जगत् की पुत्रवत् उत्पत्ति और पालन करता है, अतः इसको सोम भी कहते हैं। पीति=पा रक्षणे ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिविष्टिषु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक प्रभो ! (मरुत्सखा) = प्राणरूप मित्रों को प्राप्त करानेवाले आप (सुतं सोमम्) = उत्पन्न हुए सोम को (पिबा इत्) = शरीर में पीजिये ही। आपकी आराधना से व प्राणायाम से सोमकण शरीर में सुरक्षित रहें। [२] इस सोमरक्षण द्वारा (दिविष्टिषु) = ज्ञान के प्रकाशों के प्राप्त होने पर यह उपासक (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (वज्रं शिशानः) = [वज गतौ] गतिशीलता को तीव्र करनेवाला हो। ज्ञानी व ओजस्वी बने और गतिशील हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना द्वारा सोमरक्षण होकर हमारे ज्ञान ओज व गतिशीलता में वृद्धि हो ।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे कवयः ! अस्य+सोमस्य=जगतः। पीतये=रक्षायै। यः सूयते उत्पाद्यते स सोमः संसारः। मरुत्वन्तं=प्राणसहायकम्। इन्द्रम्। प्रत्नेन=पुराणेन। मन्मना=स्तोत्रेण यद्वा पूर्णेन स्तोत्रेण। हवामहे=स्तुमः ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, friend of cosmic winds and lover of tempestuous humans, whetting your thunderbolt with the light and lustre of justice, protect and promote the ecstatic creations of the lovers of divinity in their cherished programmes of progress.