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म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र मीढ्व॒: पिबा॒ सोमं॑ शतक्रतो । अ॒स्मिन्य॒ज्ञे पु॑रुष्टुत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

marutvām̐ indra mīḍhvaḥ pibā somaṁ śatakrato | asmin yajñe puruṣṭuta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒रुत्वा॑न् । इ॒न्द्र॒ । मी॒ढ्वः॒ । पि॒ब॒ । सोम॑म् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । पु॒रु॒ऽस्तु॒त॒ ॥ ८.७६.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:7


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसके कार्य्य का गान कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वै) निश्चय (येन+मरुत्वता) जिस प्राणसखा (इन्द्रेण) परमात्मा ने (सोमपीतये) निखिल पदार्थों की रक्षा के लिये (अयम्+ह) इन जीवगणों को अपने वश में किया है और (इदम्+स्वः) इन सम्पूर्ण सुखों और जगतों को जीता है, वह मनुष्यों का पूज्य है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जिस हेतु सम्पूर्ण चराचर जगत् को वह अपने अधीन रखता है, जिससे अव्यवस्था न होने पावे, अतः वह महान् देव स्तुत्य है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मरुत्वान् मीढ्वान्' इन्द्र

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मीढ्वः) = सब सुखों का सेचन करनेवाले (शतक्रतो) = अनन्त शक्ति व प्रज्ञानवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालि प्रभो ! आप (मरुत्वाम्) = प्राणोंवाले हैं । [२] इन प्राणों को स्थापना करते हुए आप (अस्मिन् यज्ञे) = इस जीवन-यज्ञ में (सोमं पिब) = सोमशक्ति का रक्षण करिये। हे (पुरुष्टुत) = अत्यन्त ही स्तवन किये जानेवाले प्रभो ! आप का स्तवन ही हमारा पालन व पूरण करनेवाला है। [पुरु ष्टुतं यस्य] । प्राणों की साधना करते हुए हम शरीर में सोम का रक्षण कर पायेंगे। अपने अन्दर सोम का रक्षण करते हुए हम अपने को 'शतक्रतु' बना पायें। इस सोम ने ही हमारे में शक्ति का सेचन करना है, इसी ने ज्ञानाग्नि को दीप्त करना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- वे प्रभु हमारे जीवन में सोम का रक्षण करते हुए हमें शक्ति व ज्ञान से परिपूर्ण करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तस्य कार्य्यं गीयते।

पदार्थान्वयभाषाः - येन परमात्मवाचिना वै। इन्द्रेण। अयं+ह=इन्द्रो जीवः। जीवोऽपीन्द्र उच्यते। जितः। इदं+स्वः=सुखञ्च जितम्। कस्मै प्रयोजनाय। सोमपीतये=सोमानां पदार्थानां रक्षायै। कीदृशेन। मरुत्वता ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of pranic energies and giver of showers of joy over a hundred divine acts of grace, universally sung and celebrated, pray protect and advance this world in this yajna of divine and human creation.