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वाच॑म॒ष्टाप॑दीम॒हं नव॑स्रक्तिमृत॒स्पृश॑म् । इन्द्रा॒त्परि॑ त॒न्वं॑ ममे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vācam aṣṭāpadīm ahaṁ navasraktim ṛtaspṛśam | indrāt pari tanvam mame ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वाच॑म् । अ॒ष्टाऽप॑दीम् । अ॒हम् । नव॑ऽस्रक्तिम् । ऋ॒त॒ऽस्पृश॑म् । इन्द्रा॑त् । परि॑ । त॒न्व॑म् । म॒मे॒ ॥ ८.७६.१२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:12


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमेश्वर ! (ओजसा) स्वशक्ति से (वज्रम्) अपने न्यायदण्ड को (शिशानः) तीक्ष्ण करता हुआ तू (दिविष्टिषु) इस संसारपालनरूप क्रिया में (सुतम्) स्वयमेव शुद्ध कर बनाए हुए (सोमम्) निखिल पदार्थ की (पिब+इत्) रक्षा ही कर, जिस हेतु तू (मरुत्सखा) समस्त प्राणों का सखा है ॥९॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर जिस कारण सकल आत्माओं का सखा है और ये आत्मा भोज्यादि पदार्थों के विना नहीं रह सकते, अतः पदार्थों की रक्षा करना उसका कर्त्तव्य है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अष्टापदी वाक्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं, गतमन्त्र के अनुसार 'दस्युहा' बनकर (इन्द्रात्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु से (वाचम्) = ज्ञान की वाणी को (परिममे) = अपने अन्दर निर्मित करता हूँ, जो (अष्टापदीं) = ' कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादन, सम्बन्ध, अधिकरण व सम्बोधन' रूप आठ पदोंवाली हैं। (नवस्त्रक्तिम्) = 'तिप् तस् सि-सिप् धस् थ मिप् वस् मस्' रूप नौ रूपों में निर्मित होनेवाली है। (ऋतस्पृशम्) = सब सत्यविद्याओं के स्पर्शवाली है। 'नवस्रक्तिम्' शब्द का यह भी अर्थ है कि जो नवीन स्तुत्य जीवन का निर्माण करनेवाली है। [२] इस ज्ञान की वाणी के साथ मैं प्रभु से (तन्यम्) = शक्तियों के विस्तार को [परिममे =] अपने में निर्मित करता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं प्रभु से ज्ञान की वाणी को और शक्तियों के विस्तार को प्राप्त करता हूँ । अगले सूक्त का ऋषि देवता भी 'कुरु सुति काण्व' व 'इन्द्र' ही हैं-
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र=परमेश्वर ! ओजसा=स्वशक्त्या। वज्रम्= स्वन्यायदण्डम्। शिशानः=तीक्ष्णीकुर्वन् त्वम्। दिविष्टिषु= संसारपालनयज्ञेषु। सुतं=स्वयमेव निष्पादितम्। सोमम्=सर्वं वस्तु। पिब+इत्=पालयैव। यतस्त्वम्। मरुत्सखासि ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I study, measure, develop and pray for language revealed in eight works, i.e., four Vedas and four Upavedas, spoken across four classes of humanity and through four stages of the individual’s development from birth to death, developing over nine blooming branches like flower garlands across nine regions of the earth, ultimately touching the truth of divine reality, the Word Imperishable descended from and ascending to Indra, lord of omniscience across the countless branches of dialects and structures.