अनु॑ त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे क्रक्ष॑माणमकृपेताम् । इन्द्र॒ यद्द॑स्यु॒हाभ॑वः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
anu tvā rodasī ubhe krakṣamāṇam akṛpetām | indra yad dasyuhābhavaḥ ||
पद पाठ
अनु॑ । त्वा॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । क्रक्ष॑माणम् । अ॒कृ॒पे॒ता॒म् । इन्द्र॑ । यत् । द॒स्यु॒ऽहा । अभ॑वः ॥ ८.७६.११
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:11
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:11
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिवः) हे जगत्स्वामिन् (इन्द्र) हे महेन्द्र ! (मरुत्वते) प्राणों के सखा (तुभ्य+इत्) तूने ही (सोमासः) ये समस्त पदार्थ या लोक (सुताः) बनाए हैं, इस हेतु विद्वद्गण (हृदा) हृदय से इनको (हूयन्ते) आदर करते हैं, जो पदार्थ (उक्थिनः) स्तुतिवत् या वेदवत् पवित्र हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर ने इन पदार्थों को बनाया है, अतः ये भी प्रशंसनीय हैं। इनके आदर से उसका आदर होता है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
क्रक्षमाण [one who gives a crushing defeat to his enemies]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (यद्) = जब तू (दस्युहा अभयः) = वासनारूप दास्यववृत्तियों को नष्ट करनेवाला होता है, तो (क्रक्षमाणम्) = शत्रुओं को कुचलनेवाले (त्वा अनु) = तेरे अनुसार (उभे रोदसी) = दोनों द्यावापृथिवी - मस्तिष्क व शरीर (अकृपेताम्) = सामर्थ्यसम्पन्न बनते हैं । [२] यह इन्द्र जितना - जितना वासना का विनाश करता चलता है, उसी अनुपात में उसके मस्तिष्क व शरीर शक्तिसम्पन्न होते चलते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जितेन्द्रिय बनकर वासना का विनाश करें। तभी हमारे शरीर दृढ़ व मस्तिष्क दीप्त बनेंगे।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे अद्रिवः=अद्रिः=संसारस्तस्य पते इन्द्र ! मरुत्वते+तुभ्येद्=तुभ्यमेव त्वयैव। सोमासः=सर्वे पदार्था लोका वा। सुताः=उत्पादिताः। उक्थिनः। उक्थवत् पूज्याः। इमे। हृदा+हूयन्ते=स्तूयन्ते। तेषां स्तुत्या तवैव स्तुतिर्भवति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indra, when you stimulate and energise the soma vitality of life created by nature and humanity, and when you rise as the destroyer of the negativities of the counterforce, then both heaven and earth vibrate and celebrate your majesty in awe with admiration.
