वांछित मन्त्र चुनें

उ॒त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे॑ अवेपयः । सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uttiṣṭhann ojasā saha pītvī śipre avepayaḥ | somam indra camū sutam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त्ऽतिष्ठ॑न् । ओज॑सा । स॒ह । पी॒त्वी । शिप्रे॒ इति॑ । अ॒वे॒प॒यः॒ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । च॒मू इति॑ । सु॒तम् ॥ ८.७६.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:10


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

परमात्मा की स्तुति करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (मीढ्वः) हे आनन्द की वर्षा देनेवाले (शतक्रतो) अनन्तकर्मन् (पुरुष्टुत) हे बहुस्तुत (इन्द्र) हे महेन्द्र ! (अस्मिन्+यज्ञे) इस सृजन पालन संहरण दयादर्शन आदि क्रिया के निमित्त (सोमं+पिब) इस संसार की रक्षा कर अथवा समस्त पदार्थों को कृपादृष्टि से देख, जिस हेतु तू (मरुत्वान्) प्राणों का सखा है ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस जगत् में सृजन, पालन, दया, रक्षा परस्पर साहाय्य और संहार आदि व्यापार हो रहे हैं, वे सब ही ईश्वरीय यज्ञ हैं। इसको हे मनुष्यों ! तुम भी पूर्ण करो ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शिप्रे अवेपयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष तू (चमू सुतम्) = मस्तिष्क व शरीर के निमित्त उत्पन्न किये गये (सोमम्) = सोम को - वीर्यशक्ति को (पीत्वी) = शरीर में ही सुरक्षित करके (ओजसा सह) = ओजस्विता के साथ उत्तिष्ठन् उन्नत होता हुआ (शिप्रे) = शत्रुओं के जबड़ों को (अवेपयः) = कम्पित कर देता है । [२] शरीर में प्रभु ने सोमशक्ति को स्थापित किया है। यह शरीर को शक्तिशाली बनाती है और मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त करती है। इसके रक्षण से ओजस्वी बनकर हम शत्रुओं को परास्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें वह शक्ति प्राप्त कराता है जो हमें शत्रुओं को पराभूत करने में समर्थ करती है।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

परमात्मा स्तूयते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मीढ्वः=आनन्दसेक्तः ! हे शतक्रतो=अनन्तकर्मन् ! हे पुरुस्तुत=बहुजनस्तुत ! हे इन्द्र=ईश ! अस्मिन् यज्ञे=पालनादिकार्य्ये। मरुत्वाँस्त्वम्। सोमं+पिब=संसारं रक्ष। पा रक्षणे यद्वा कृपया अवलोकय ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of the universe, rising with your might and majesty, protect and energise both heaven and earth and promote the soma of life’s vitality created in both heaven and earth by nature and humanity by yajna.