इ॒मं नु मा॒यिनं॑ हुव॒ इन्द्र॒मीशा॑न॒मोज॑सा । म॒रुत्व॑न्तं॒ न वृ॒ञ्जसे॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
imaṁ nu māyinaṁ huva indram īśānam ojasā | marutvantaṁ na vṛñjase ||
पद पाठ
इ॒मम् । नु । मा॒यिन॑म् । हु॒वे॒ । इन्द्र॑म् । ईशा॑नम् । ओज॑सा । म॒रुत्व॑न्तम् । न वृ॒ञ्जसे॑ ॥ ८.७६.१
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:76» मन्त्र:1
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:27» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:1
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य+नमस्विनः) जिस परमात्मभक्त के (वा) अथवा (अदुर्मखस्य) अच्छे शुभ कर्म करनेवाले के (शमीम्) कर्म में विद्वद्गण (अजुषत्) जाते और उसके कर्म को शुद्ध करवाते (तं+घ+इत्) उसी पुरुष को (अग्निः) परमात्मा (वृधा) सर्व वस्तु की वृद्धि करके (अवति) बचाता है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक शुभकर्म में विद्वानों का सत्कार और उनसे शुद्धकर्म करावे, तभी कल्याण होता है ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मापिनं, ओजसा ईशानम्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नु) = निश्चय से मैं (इमं इन्द्रम्) = इस परमैश्वर्यशाली प्रभु को हुवे पुकारता हूँ। उस इन्द्र को, जो (मायिनम्) = प्रज्ञावाले हैं- सर्वज्ञ हैं, (ओजसा ईशानम्) = अपने बल से सम्पूर्ण संसार के ईशान [स्वामी] हैं। [२] (न) [च] =और मैं उस इन्द्र को पुकारता हूँ जो (मरुत्वन्तम्) = [मरुतः प्राणाः] प्राणशक्तिवाले हैं। इन प्राणों के द्वारा (वृञ्जसे) = शत्रुओं के छेदन के लिये हैं । प्राणसाधना के द्वारा न केवल रोगों का ही नाश होता है, अपितु वासनाओं का भी विनाश होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान् हैं। हमें प्राणों को देते हुए इस योग्य बनाते हैं कि हम रोगों व वासनाओं को विच्छिन्न कर सकें।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - यस्य+नमस्विनः=यस्य+ईश्वरोपासकस्य। अदुर्मखस्य वा=अदुष्टयागस्य वा। शमीं=कर्म। विद्वद्गणः। अजुषत्=सेवते। तं+घ+इत्=तमेव पुरुषम्। अग्निः परमात्मदेवः। वृधा+अवति=वृद्ध्या रक्षति ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - I invoke the almighty Indra, omnipotent spiritual power and presence of existence who commands the winds and pranic energies of nature and rules them by his lustrous vigour and vitality, and I pray that he may never forsake me, never abandon my spiritual salvation over material fluctuations of the mind.
