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उ॒त नो॑ देव दे॒वाँ अच्छा॑ वोचो वि॒दुष्ट॑रः । श्रद्विश्वा॒ वार्या॑ कृधि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta no deva devām̐ acchā voco viduṣṭaraḥ | śrad viśvā vāryā kṛdhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त । नः॒ । दे॒व॒ । दे॒वान् । अच्छ॑ । वो॒चः॒ । वि॒दुःऽत॑रः । श्रत् । विश्वा॑ । वार्या॑ । कृ॒धि॒ ॥ ८.७५.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:75» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (शविष्ठस्य) परम बलवान् परमात्मा की कृपा से प्राप्त (आशवः) अपने-
भावार्थभाषाः - अपने विषय में अति निपुण (द्रवित्नवः) आलस्यरहित (सुरथासः) शरीररूप सुन्दर रथयुक्त (चत्वारः) चक्षु, श्रोत्र, घ्राण और रसनारूप चार ज्ञान इन्द्रिय (माम्) मुझको (प्रयः) विविध सुख (अभि+वक्षन्) पहुँचा रहे हैं। (न) जैसे (वयः) नौकाएँ (तुग्य्रम्) भोज्यादि पदार्थ को इधर-उधर पहुँचाते हैं ॥१४॥
टिप्पणी: जो कोई अपने ज्ञानेन्द्रिय के तत्त्वों को समझ उनको काम में लगाते है, वे ही जगत् में परम धनाढ्य होते हैं ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विदुष्टरः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (देव) = ज्ञानी ! तू (विदुस्तरः) = श्रेष्ठ विद्वान् होकर (देवान्) = ज्ञानेच्छुक (नः) = हमको (अच्छ वोचः) = उपदेश कर, (उत) = तथा (विश्वा) = सम्पूर्ण वार्यावरणीय ज्ञानों को (श्रत्) = सत्य ही (कृधि) = प्रकट कर।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ ज्ञान को प्रकट करे छिपाये नहीं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - शविष्ठस्य=परमबलवतः परमात्मनः कृपया। मामुपासकम्। आशवः=स्व-स्व-विषय-पटुतराः। द्रवित्नवः=गमनशीलाः। सुरथासः=शोभनरथाः। चत्वारः=चक्षुरादीनि चत्वारि ज्ञानेन्द्रियाणि। प्रयः=विविधसुखम्। अभि+वक्षन्= अभिवहन्ति। अत्र दृष्टान्तः। वयः+न=यथा नाविकाः। तुग्य्रं=समुद्रे निमग्नं पुरुषं तटमानयन्ति ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And O light of the world, omniscient lord, speak graciously to us, seekers of light and divinity, and reveal in truth the facts and processes cherished and valued on top of everything else for the good of life in existence.