अव॑न्त॒मत्र॑ये गृ॒हं कृ॑णु॒तं यु॒वम॑श्विना । अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मव॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
avantam atraye gṛhaṁ kṛṇutaṁ yuvam aśvinā | anti ṣad bhūtu vām avaḥ ||
पद पाठ
अव॑न्तम् । अत्र॑ये । गृ॒हम् । कृ॒णु॒तम् । यु॒वम् । अ॒श्वि॒ना॒ । अन्ति॑ । सत् । भू॒तु॒ । वा॒म् । अवः॑ ॥ ८.७३.७
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:73» मन्त्र:7
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:7
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शिव शंकर शर्मा
फिर उसी अर्थ को कहते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विद्वय ! (राजा और सचिव) इस समय (कुह) कहाँ आप दोनों (स्थः) हैं, (कुह) कहाँ गए हुए हैं। (कुह) कहाँ (श्येना+इव) दो श्येन पक्षी के समान उड़ कर बैठे हुए हैं, व्यर्थ इधर-उधर आपका जाना उचित नहीं। जहाँ कहीं हों, वहाँ से आकर प्रजाओं की रक्षा कीजिये। अन्ति० ॥४॥
भावार्थभाषाः - प्रजाओं के निकट यदि राजा या राजसाहाय्य न पहुँचे, तो जहाँ वे हों, वहाँ से उनको बुला लाना चाहिये। राजा सर्वकार्य को छोड़ इस रक्षाधर्म का सब प्रकार से पालन करे ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अत्रि का 'अवन् गृह'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (युवम्) = आप (अत्रये) = 'काम-क्रोध व लोभ' से ऊपर उठे हुए पुरुष के लिए (अवन्तं गृहं कृणुतम्) = रक्षक घर को बनाओ। प्राणसाधना द्वारा यह साधक 'काम- क्रोध व लोभ' से दूर हो तथा इस साधना से यह शरीरगृह रोगाक्रान्त न हो। इसमें रहता हुआ अत्रि रोगरूप शत्रुओं से बचा रहे। [२] हे प्राणापानो! (वाम्) = आपका (अव:) = रक्षण (सत्) = उत्तम है। वह रक्षण (अन्ति भूतु) = हमें समीपता से प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से यह शरीरंगृह सदा, सुरक्षित गृह हो। इसमें आधि-व्याधि से बचे रहें।
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शिव शंकर शर्मा
पुनस्तमर्थमाह।
पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ ! युवाम्। इदानीं कुह=क्वस्थो भवथो वर्त्तेथे। कुह=क्व जग्मथुर्गच्छथः। कुह क्व च। श्येना=श्येनौ विहगौ इव। पेतथुः=पतथः। यत्र कुत्र च भवथस्तस्मात् स्थानादागत्य प्रजारक्षणं कुरुतम्। मुधैव इतश्चेतश्च मा गमतम् अन्ति गतम् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, for the man of threefold deprivation of health care, housing and employment, provide a home of security and maintenance. Pray let your protections be with us always without delay at the closest.
