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यद॒द्य कर्हि॒ कर्हि॑ चिच्छुश्रू॒यात॑मि॒मं हव॑म् । अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad adya karhi karhi cic chuśrūyātam imaṁ havam | anti ṣad bhūtu vām avaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । अ॒द्य । कर्हि॑ । कर्हि॑ । चि॒त् । शु॒श्रू॒यात॑म् । इ॒मम् । हव॑म् । अन्ति॑ । सत् । भू॒तु॒ । वा॒म् । अवः॑ ॥ ८.७३.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:73» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:18» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

फिर उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे प्रशस्ताश्वयुक्त राजा और मन्त्री ! (निमेषः+चित्) क्षणमात्र में आप सत्याचारी पुरुष के लिये (जवीयसा+रथेन) अतिशय वेगवान् रथ के द्वारा (आ+यातम्) आइये। (अन्ति) अन्ति इत्यादि का अर्थ प्रथम मन्त्र में देखो ॥२॥
भावार्थभाषाः - इसका स्पष्ट है, अतः लिखा नहीं गया ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुप्रेरणा का श्रावण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! (यद्) = जब (अद्य) = आज (कर्हि चित्) = किसी समय (इमं हवम्) = इस हृदयस्थ प्रभु की पुकार को (शुश्रूयातम्) = सुनते हो, तो (वाम्) = आपका यह (सत् अवः) = उत्तम रक्षण (अन्ति भूतु) = हमारे सदा समीप हो। [२] प्राणसाधना से हृदय की निर्मलता प्राप्त होती है और उस निर्मल हृदय में प्रभु की प्रेरणा सुनाई पड़ती है। यह प्रभुप्रेरणा हमारा मार्गदर्शन करती हुई हमारा रक्षण करती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से हृदय की निर्मलता सिद्ध होती है। उस निर्मल हृदय में प्रभु की प्रेरणा सुनाई पड़ती है।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना=अश्विनौ प्रशस्ताश्वयुक्तौ ! निमिषश्चिद्= निमेषादपि क्षणादपि। ऋतायते जनाय। जवीयसा= अतिशयवेगवता। रथेन। युवाम्। आयातं=आगच्छतम्। अन्तिप्रभृति गतम् ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - If now anywhere, in fact any time, you hear our call, let your protections be instantly with us at the earliest at the closest.