पुरं॒ न धृ॑ष्ण॒वा रु॑ज कृ॒ष्णया॑ बाधि॒तो वि॒शा । अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मव॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
puraṁ na dhṛṣṇav ā ruja kṛṣṇayā bādhito viśā | anti ṣad bhūtu vām avaḥ ||
पद पाठ
पुर॑म् । न । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । आ । रु॒ज॒ । कृ॒ष्णया॑ । बा॒धि॒तः । वि॒शा । अन्ति॑ । सत् । भू॒तु॒ । वा॒म् । अवः॑ ॥ ८.७३.१८
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:73» मन्त्र:18
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:20» मन्त्र:8
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:18
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे राजा ! और अमात्य ! (सहस्रेभिः) बहुत (गव्येभिः) गोसमूह से तथा (अश्व्येभिः) अश्वसमूह से (नः) हमको (मा+अति+ख्यतम्) वियोजित मत कीजिये, दूर मत कीजिये ॥१५॥
भावार्थभाषाः - पशुओं की भी न्यूनता देश में न हो, वैसा प्रबन्ध करे ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'कृष्णा विद्' के दुर्ग का विध्वंस
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (धृष्णोः) = प्राणसाधना द्वारा वासनाओं का धर्षण करनेवाले साधक [सप्त वध्रे] ! तू (कृष्णया) = [कर्ष वा] जबर्दस्ती अपनी ओर खींचनेवाली (विशा) = अन्दर घुस आनेवाली वासनाओं से (बाधितः) = पीड़ित हुआ हुआ इन वासनाओं को प्राणसाधना द्वारा इस प्रकार (आरुज) = छिन्न-भिन्न कर (न) = जैसे (पुरं) = शत्रु की नगरी का ध्वंस किया जाता है। [२] यही तेरी आराधना हो कि हे प्राणापानो ! (वाम्) = आपका (सत् अवः) = उत्तम रक्षण (अन्ति भूतु) = हमें समीपता से प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्राणसाधना द्वारा काम-क्रोध-लोभरूप वासनाओं के दुर्गों का विध्वंस कर डालें। 'गोपवन' ही अगले सूक्त का भी ऋषि है-
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ ! युवाम्। सहस्रेभिः=सहस्रैर्बहुभिः। गव्येभिः=गव्यैर्गोसमूहैः। अश्व्यैः=अश्वसमूहैः सह। नोऽस्मान्। मा नहि। अति+ख्यतम्=वियोजयतं दूरीकरुतमित्यर्थः ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Brave humanity, whenever you are obstructed by dark forces, arise and break them down like a fortress of evil. Ashvins, let your forces and protections be ever with us at the closest for inspiration and exhortation.
