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आ द॒शभि॑र्वि॒वस्व॑त॒ इन्द्र॒: कोश॑मचुच्यवीत् । खेद॑या त्रि॒वृता॑ दि॒वः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ā daśabhir vivasvata indraḥ kośam acucyavīt | khedayā trivṛtā divaḥ ||
पद पाठ
आ । द॒शऽभिः॑ । वि॒वस्व॑तः । इन्द्रः॑ । कोश॑म् । अ॒चु॒च्य॒वी॒त् । खेद॑या । त्रि॒ऽवृता॑ । दि॒वः ॥ ८.७२.८
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:72» मन्त्र:8
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:15» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:8
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विवस्वान् के कोश का आच्यवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (दशभिः) = दसों इन्द्रियों के द्वारा (विवस्वतः कोशम्) = प्रकाशमय प्रभु के ज्ञान के कोश को (आ अचुच्यवीत्) = अपने अन्दर क्षरित करता है । [२] (त्रिवृतता) = [त्रिषु वर्तते] प्रकृति, जीव, परमात्मा में वर्तनेवाली (दिवः) = ज्ञान की (खेदया) = रश्मि के हेतु से यह जितेन्द्रिय पुरुष (विवस्वान्) = के कोश को अपने में क्षरित करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जितेन्द्रिय बनकर हम दसों इन्द्रियों से ज्ञान का वर्धन करनेवाले बनें। हमें प्रकृति, जीव व परमात्मा के ज्ञान की रश्मियाँ प्राप्त हों।
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Just as Indra, electric energy of the sun in the form of lightning, breaks the cloud and brings down showers from the sky, so does the divine human soul by threefold passion of intellect, will and emotion, with the assistance of ten senses of perception and volition and ten pranic energies, distill down the treasure glory of Agni from the sun into threefold wealth of knowledge, action and prayer committed and dedicated to divinity.
