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अग्ने॒ माकि॑ष्टे दे॒वस्य॑ रा॒तिमदे॑वो युयोत । त्वमी॑शिषे॒ वसू॑नाम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
agne mākiṣ ṭe devasya rātim adevo yuyota | tvam īśiṣe vasūnām ||
पद पाठ
अग्ने॑ । माकिः॑ । ते॒ । दे॒वस्य॑ । रा॒तिम् । अदे॑वः । यु॒यो॒त॒ । त्वम् । ई॒शि॒षे॒ । वसू॑नाम् ॥ ८.७१.८
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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:71» मन्त्र:8
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:12» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:8
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (विप्र) हे जगत्पोषक, हे प्रेम से संसारदर्शक (अग्ने) सर्वाधार ईश ! (मेधसातौ) देवयज्ञ में (धनाय) धनों की प्राप्ति के लिये (यम्+त्वम्) जिसको तू (हिनोषि) प्रेरणा करता है, (सः) वह (तव+ऊती) तेरी सहायता और रक्षा से (गोषु+गन्ता) गौ आदि पशुओं का स्वामी होता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - गो शब्द अनेकार्थ प्रसिद्ध है। जो कोई देवयज्ञ करता है, उसको सब प्रकार के धन प्राप्त होते हैं और (गौ) सकल इन्द्रिय उसके वशीभूत होते हैं ॥५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु की देन को कोई नहीं रोक पाता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (तं देवस्य रातिम्) = आप देव के दान को (अदेवा) = कोई भी अदेव-दानवीवृत्तिवाला पुरुष (माकिः युयोत) = हमारे से पृथक् न करे। हम प्रभु को दानों को सदा प्राप्त करते रहें। [२] हे प्रभो ! (त्वं) = आप ही (वसूनाम् ईशिषे) = सब वसुओं के ईश हैं। आप ही सब वसुओं के देनेवाले हैं। देनेवाले आपको रोक ही कौन सकता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की देन को कोई भी अदेव वृत्तिवाला पुरुष विहत नहीं कर सकता। प्रभु ही सब वसुओं के ईश हैं।
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे विप्र=“विशेषेण प्राति=पूरयति जगदिदं स विप्रः” हे जगत्पोषक ! हे अग्ने ! हे भक्तजन ! मेधसातौ=देवयज्ञे। धनाय=सम्पत्त्यै। हिनोषि=नोदयसि। स तवोत्या पालनेन। गोषु+गन्ता=गवां स्वामी भवतीत्यर्थः ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of brilliance and generosity, let no impious man deprive us of your generosity extended to us. You rule, control and protect the wealth, honour and excellence of the world.
