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देवता: इन्द्र: ऋषि: पुरुहन्मा छन्द: बृहती स्वर: मध्यमः

उदू॒ षु णो॑ वसो म॒हे मृ॒शस्व॑ शूर॒ राध॑से । उदू॒ षु म॒ह्यै म॑घवन्म॒घत्त॑य॒ उदि॑न्द्र॒ श्रव॑से म॒हे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ud ū ṣu ṇo vaso mahe mṛśasva śūra rādhase | ud ū ṣu mahyai maghavan maghattaya ud indra śravase mahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत् । ऊँ॒ इति॑ । सु । नः॒ । व॒सो॒ इति॑ । म॒हे । मृ॒शस्व॑ । शू॒र॒ । राध॑से । उत् । ऊँ॒ इति॑ । सु । म॒ह्यै । म॒घ॒ऽव॒न् । म॒घत्त॑ये । उत् । इ॒न्द्र॒ । श्रव॑से । म॒हे ॥ ८.७०.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:70» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषन्) हे अभीष्टफलवर्षक (शविष्ठ) हे परमशक्तिशालिन् (मघवन्) हे महाधनेश्वर (वज्रिन्) हे न्यायकारिन् देव ! तू (महिना) स्वकीय महिमा से (वृष्ण्या) आनन्दवर्षाकारक (शवसा) बल द्वारा (विश्वा) समस्त जगत् को (आ+पप्राथ) अच्छे प्रकार पूर्ण कर रहा है, अतः हे भगवन् ! (गोमति+व्रजे) गवादि पशुयुक्त गोष्ठ में (चित्राभिः+ऊतिभिः) विविध रक्षाओं और साहाय्यों से (अस्मान्+अव) हमारी रक्षा और साहाय्य कर ॥६॥
भावार्थभाषाः - जिस कारण वह देव स्वयं सम्पूर्ण जगत् को सुखों से पूर्ण कर रहा है, अतः धन्यवादार्थ उसकी कीर्ति गाओ ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राधसे, मधत्तये, श्रवसे

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वसो) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो ! आप (नः) = हमें (उ) = निश्चय से (सु) = अच्छी प्रकार (महे राधसे) = महान् ऐश्वर्य के लिए (उन्मृशस्व) = स्पर्श करिये। आपके सम्पर्क से हम उत्कृष्ट ऐश्वर्य को प्राप्त करें। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् ! (उ) = और (सु) = सम्यक् (म मघत्तये) = महान् ऐश्वर्य के दान के लिए हमें ऊँचा उठाइए [उत्थापय] । [३] हे (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक प्रभो ! (महे अवसे) = महान् यश व ज्ञान के लिए (उत्) = हमें उठाइए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु के सम्पर्क से, ऐश्वर्य को दान की वृत्ति को तथा महान् यश को प्राप्त करें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे वृषन्=अभीष्टफलवर्षक ! हे शविष्ठ=अतिशयबलवन्। हे मघवन्=महाधन ! हे वज्रिन्=न्यायिन् ! जगदीश ! त्वं स्वकीयेन। महिना=महत्त्वेन। वृष्ण्या=आनन्दप्रदेन। शवसा=शक्त्या। विश्वा=विश्वानि जगन्ति। आपप्रथ=आपूरयसि। तथा। गोमति+व्रजे= गवादिपशुयुक्ते गोष्ठे। चित्राभिर्बहुविधाभिः। ऊतिभिः=रक्षाभिः। अस्मान्। अव=रक्ष ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brave Indra, lord of the wealth, honour and excellence of the world, haven and home of all living beings, inspire our will and intelligence for the achievement of great wealth and competence for success in life and raise us to great power, honour and excellence to win high fame across the world.