'गाधेषु आ-रणेषु वाजेषु' हव्यः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं) = उस (वः महः) = तुम्हारे तेज [महस् - Power or Lustre ] व दीप्तिरूप उस प्रभु का परिचरण करो। वे प्रभु ही तुम्हें तेजस्विता व दीप्ति प्राप्त करानेवाले हैं। (महाय्यं इन्द्र) = उस पूजनीय - शत्रुविद्रावक प्रभु को ही पूजो । (दानाय) = शत्रुओं के खण्डन के लिए (सक्षणिम्) = उपासकों के साथ समवेत होनेवाले प्रभु को पूजो। [२] (यः) = जो प्रभु (गाधेषु) = [ गाधृ प्रतिष्ठायाम्] प्रतिष्ठा को प्राप्त करानेवाले कार्यों में (हव्यः) = पुकारने योग्य हैं। प्रभु ही तो उन कार्यों को निर्विघ्नता से पूर्ण करेंगे। (यः) = जो प्रभु (आ-रणेषु) = समन्तात् आनन्दमय रमणीय कार्यों में भी पुकारने योग्य हैं। वे प्रभु ही (वाजेषु) = संग्रामों में (हव्यः) = पुकारने योग्य अस्ति हैं। प्रभु ने ही हमें उन संग्रामों में विजय प्राप्त करानी हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का पूजन करेंगे तो प्रभु की शक्ति से हम शक्तिसम्पन्न बनेंगे। तभी हम उत्तम कार्यों को करके प्रतिष्ठा को प्राप्त करेंगे। तभी उत्तम कार्यों को प्राप्त करके आनन्दित होंगे। तभी संग्रामों में विजयी होंगे।