वांछित मन्त्र चुनें

इन्द्रं॒ तं शु॑म्भ पुरुहन्म॒न्नव॑से॒ यस्य॑ द्वि॒ता वि॑ध॒र्तरि॑ । हस्ता॑य॒ वज्र॒: प्रति॑ धायि दर्श॒तो म॒हो दि॒वे न सूर्य॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indraṁ taṁ śumbha puruhanmann avase yasya dvitā vidhartari | hastāya vajraḥ prati dhāyi darśato maho dive na sūryaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र॑म् । तम् । शु॒म्भ॒ । पु॒रु॒ऽह॒न्म॒न् । अव॑से । यस्य॑ । द्वि॒ता । वि॒ऽध॒र्तरि॑ । हस्ता॑य । वज्रः॑ । प्रति॑ । धा॒यि॒ । द॒र्श॒तः । म॒हः । दि॒वे । न । सूर्यः॑ ॥ ८.७०.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:70» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वज्रः-सूर्यः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुहन्मन्) = खूब ही शत्रुओं का हनन करनेवाले जीव ! तू (तं) = उस (इन्द्रं) = शत्रुविद्रावक प्रभु को (अवसे) = रक्षण के लिए (शुम्भ) = अपने जीवन में अलङ्कृत कर उस प्रभु को अलंकृत कर (यस्य द्विता) = जिसका दोनों ओर विस्तार है-उस प्रभु की अनन्त शक्ति है और अनन्त ज्ञान है। प्रभु को धारण करने पर हम भी ज्ञान व शक्ति को प्राप्त करेंगे। [२] उस (विधर्तरि) = विशेष रूप से धारण करनेवाले प्रभु में (हस्ताय) = [ हननाय ] शत्रुसंहार के लिए (दर्शतः) = दर्शनीय (महः) = महान् (वज्र:) = वज्र (प्रतिधायि) = धारण किया जाता है। (नः) = और [च] दिवे प्रकाश के लिए (सूर्य:) = सूर्य धारण किया जाता है। 'वज्र' शत्रुसंहार की शक्ति का प्रतीक है और 'सूर्य' ज्ञान का।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने जीवनों में प्रभु का धारण करें। प्रभु शत्रुहनन के लिए वज्र का धारण करते हैं और प्रकाश के लिए सूर्य का । प्रभु का धारण हमें शक्ति व प्रकाश प्राप्त कराएगा।
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man of universal devotion, exalt and glorify that omnipotent Indra for protection and progress in whom, as ruler and controller of the world, both justice and mercy abide simultaneously, who holds the thunderbolt of power in hand, and who is great and glorious like the sun in heaven.