पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब (एषाम्) = इन प्राणसाधकों के (रथे) = शरीर-रथ में (पृषतीः) = इन इन्द्रिय मृगों को, इन्द्रियरूप मृगों को वह (रोहितः) = सब दृष्टिकोणों से बढ़ा हुआ (प्रष्टिः) = द्रष्टा प्रभु [ अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति] (वहति) = प्राप्त कराता है, अर्थात् प्रभु इनका नियन्ता बनता है, तो ये साधक (शुभ्राः) = शुभ्र जीवनवाले बनकर (यान्ति) = गतिशील होते हैं। (अपः) = रेतः कणरूप जलों को (रिणन्) = अपने अन्दर प्रेरित करते हैं । [२] हमारे इस शरीर रथ का नियन्ता प्रभु बनें। वह द्रष्टा प्रभु जब हमारे इन इन्द्रिय मृगों के नियन्ता बनते हैं, तो हमारे जीवन में किसी प्रकार की मलिनता नहीं आती। जीवन शुभ्र बन जाता है। उस समय रेतःकणों की ऊर्ध्वगति होकर जीवन 'नीरोग, निर्मल व दीप्त' बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे इन्द्रिय मृगों के नियन्ता बनें। ऐसा होने पर हमारे जीवन शुभ्र बनेंगे। शक्तिकण शरीर में ही प्रेरित होंगे।