पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'मरुत्' - प्राण हैं । प्राणसाधना करनेवाले पुरुष भी मरुत् कहलाते हैं। ये मरुत् 'विद्युद् हस्ता:'= विद्युत् से बने हाथोंवाले, अर्थात् शीघ्रता से कार्य करनेवाले, (अभिद्यवः) = सब ओर से दीप्तिवाले, तेजस्वी (शुभ्रा:) = निर्मल जीवनवाले होते हैं। इनके मनों में राग-द्वेष आदि का मल नहीं होता। [२] ये प्राणसाधक पुरुष (शीर्षन्) = अपने सिरों पर (हिरण्ययीः) = ज्योतिर्मय (शिप्राः) = शिरस्त्राणों को (व्यञ्जत) = प्रकट करते हैं और (श्रिये) = शोभा के लिये होते हैं। योद्धाओं ने सिरों के रक्षण के लिये शिरस्त्राण [टोपियो] धारण किये होते हैं। इन प्राणसाधकों ने भी मस्तिष्क में ज्ञानरूप शिरस्त्राण को ही मानो स्थापित किया होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से [क] हाथ विद्युत् के समान शीघ्रता से कार्यों को करते हैं, [ख] शरीर सब ओर दीप्तिवाला, तेजस्वी बनता है, [ग] मस्तिष्क में ज्ञानरूप शिरस्त्राण की स्थापना होती है, [घ] इन साधकों के हृदय निर्मल होते हैं।