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न॒दं व॒ ओद॑तीनां न॒दं योयु॑वतीनाम् । पतिं॑ वो॒ अघ्न्या॑नां धेनू॒नामि॑षुध्यसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nadaṁ va odatīnāṁ nadaṁ yoyuvatīnām | patiṁ vo aghnyānāṁ dhenūnām iṣudhyasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒दम् । वः॒ । ओद॑तीनाम् । न॒दम् । योयु॑वतीनाम् । पति॑म् । वः॒ । अघ्न्या॑नाम् । धे॒नू॒नाम् । इ॒षु॒ध्य॒सि॒ ॥ ८.६९.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:69» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

बुद्धि का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषु+ऋज्रेषु) इन सरलगामी इन्द्रियों में (अन्तः) मध्य एक (कशावती) विवेकवती बुद्धिरूपा नारी (आचेतत्) सबको चिताती और शासन करती है, जो (वृषण्वती) सुख की वर्षा करनेवाली है और (स्वभीशुः) जिसके हाथ में अच्छा लगाम है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - इन इन्द्रियों के साथ अद्भुत शक्तिशालिनी जो विवेकवती बुद्धि है, उसको मनन आदि व्यापारों से सदा बढ़ाना और शुद्ध-शुद्ध रखना चाहिये, यह सम्पूर्ण जगत् इसी के वश में है ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ओदती-योयुवती - अघ्न्या' धेनु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वः) = तुम्हें (ओदतीनां) = ज्ञान जल से सीचनेवाली [उन्दी क्लदने] वेदवाणियों के (नदं) = उच्चारण करनेवाले से [को] (योयुवतीनाम्) = सब बुराइयों से पृथक् करनेवाली वेदवाणियों के (नदं) = उच्चारण करनेवाले प्रभु के से ही तू (इषुध्यसि) = प्रार्थना करता है। [२] (वः) = तुम्हारे लिए (अघ्न्यानां) = अहन्तव्य सदा अध्ययन के योग्य (धेनूनां) = ज्ञानदुग्ध को देनेवाली वेदवाणियाँरूप गौओं के (पतिं) = स्वामी उस प्रभु से ही तू प्रार्थना करता हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें चाहिए कि हम प्रभु से यही आराधना करें कि वे प्रभु हमें ज्ञानजल से सिक्त करनेवाली वेदवाणियों को प्राप्त कराएँ। वे हमें उन वाणियों को प्राप्त कराएँ जो हमें सब बुराइयों से पृथक् करती हैं। प्रभु की ये वेद- धेनुएँ हमारे लिए अहन्तव्य हैं-हमें सदा इनका स्वाध्याय करना चाहिए।
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शिव शंकर शर्मा

बुद्धिं वर्णयति।

पदार्थान्वयभाषाः - एषु+ऋज्रेषु=ऋजुगामिषु। इन्द्रियाश्वेषु अन्तर्मध्ये। एका। कशावती=विवेकवती बुद्धिर्नारी। आचेतत्=आचेतयति ज्ञानशक्त्या शास्तीत्यर्थः। कीदृशी वृषण्वती=वर्षाकारिणी। पुनः। अरुषी=आरोचमाना=शोभमाना। पुनः। स्वभीशुः= सुप्रग्रहा ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra is the resounding source of fresh energies, roaring expression of maiden youthfulness, protector and promoter of sacred sources of production and nourishment such as cows which must not be killed or hurt, and he is the relentless inexhaustible keeper of your arrows for your targets of defence and development.