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अ॒र्भ॒को न कु॑मार॒कोऽधि॑ तिष्ठ॒न्नवं॒ रथ॑म् । स प॑क्षन्महि॒षं मृ॒गं पि॒त्रे मा॒त्रे वि॑भु॒क्रतु॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

arbhako na kumārako dhi tiṣṭhan navaṁ ratham | sa pakṣan mahiṣam mṛgam pitre mātre vibhukratum ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒र्भ॒कः । न । कु॒मार॒कः । अधि॑ । ति॒ष्ठ॒त् । नव॑म् । रथ॑म् । सः । प॒क्ष॒त् । म॒हि॒षम् । मृ॒गम् । पि॒त्रे । मा॒त्रे । वि॒भु॒ऽक्रतु॑म् ॥ ८.६९.१५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:69» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:15


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'त्वमेव माता च पिता त्वमेव '

पदार्थान्वयभाषाः - जीव को चाहिए कि (अर्भकः न) = एक छोटे बालक के समान हो । (कुमारकः) = वह सब क्रीड़ा को करनेवाला हो As innocent as a child = एक बालक के समान निर्दोष व्यवहारवाला हो- व्यर्थ में चुस्त चालाक न बने। (नवं रथं अधितिष्ठन्) = इस स्तुत्य व गतिशील [नु स्तुतौ, नव गतौ] शरीररथ पर आरूढ़ होता हुआ (सः) = वह (पित्रे मात्रे) = पिता व माता के लिए उस (महिष) = पूजनीय (मृगं) = अन्वेषणीय (विभुक्रतुम्) = सर्वव्यापक प्रज्ञानस्वरूप प्रभु को (पक्षत्) = परिगृहीत करे [पक्ष परिग्रहे]।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम बालकों की तरह निर्दोष जीवनवाले बनें। शरीररथ को स्तुत्य व गतिशील बनाएँ। प्रभु को ही माता व पिता समझें । प्रभु पूज्य हैं, अन्वेषणीय हैं, सर्वव्यापक व प्रज्ञानस्वरूप हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Neither a child nor an adolescent, the man of mature mind abiding in a healthy body practices meditation and realises the great, supreme, omnipotent cosmic soul of universal holy action for the enlightenment of all about Mother Nature and the father of creation.