वांछित मन्त्र चुनें

अतीदु॑ श॒क्र ओ॑हत॒ इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विष॑: । भि॒नत्क॒नीन॑ ओद॒नं प॒च्यमा॑नं प॒रो गि॒रा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atīd u śakra ohata indro viśvā ati dviṣaḥ | bhinat kanīna odanam pacyamānam paro girā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अति॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । श॒क्रः । अ॒ह॒ते॒ । इन्द्रः॑ । विश्वाः॑ । अति॑ । द्विषः॑ । भि॒नत् । क॒नीनः॑ । ओ॒द॒नम् । प॒च्यमा॑नम् । प॒रः । गि॒रा ॥ ८.६९.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:69» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:14


0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मुक्तिप्रदाता' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शक्रः) = वह सर्वशक्तिमान् प्रभु (इत् उ) = निश्चय ही (अति ओहते) = हमें भवसागर के पार ले जाता है। (इन्द्रः) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला प्रभु (विश्वाः द्विषः) = सब द्वेषों के (अति) = पार प्राप्त करता है। [२] वह (कनीनः) = [ कन दीप्तौ ] दीप्त प्रभु - प्रकाशमय प्रभु (परः) = सबसे परस्तात् वर्तमान हैं-सब गुणों के दृष्टिकोण से परे हैं- उत्कृष्ट हैं। वे प्रभु ही (गिराः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (पच्यमानं) = परिपक्व किये जाते हुए इस (ओदनं) = हमारे अन्नमय कोश को इस स्थूल शरीर के (भिनत्) = हमारे से पृथक् करते हैं-हमें मुक्ति के मार्ग पर आगे ले चलते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही ' शक्र' हैं, 'इन्द्र ' हैं। वे ही हमें सब द्वेषों से ऊपर उठाते हैं और ज्ञानाग्नि में परिपक्व करके हमें मुक्त करते हैं।
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, the sovereign soul of self-power, transcends all jealousy, malignity and enmity and, blest with top handsomeness and grace of the spirit, breaks open into words the mature knowledge and self-realised spiritual food for the seekers.