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यो व्यतीँ॒रफा॑णय॒त्सुयु॑क्ताँ॒ उप॑ दा॒शुषे॑ । त॒क्वो ने॒ता तदिद्वपु॑रुप॒मा यो अमु॑च्यत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo vyatīm̐r aphāṇayat suyuktām̐ upa dāśuṣe | takvo netā tad id vapur upamā yo amucyata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । व्यती॑न् । अफा॑णयत् । सुऽयु॑क्तान् । उप॑ । दा॒शुषे॑ । त॒क्वः । ने॒ता । तत् । इत् । वपुः॑ । उ॒प॒ऽमा । यः । अमु॑च्यत ॥ ८.६९.१३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:69» मन्त्र:13 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:13


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वपुः [यो अमुच्यत]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (दाशुषे) = दानशील अथवा अपने को प्रभु के प्रति अर्पण करनेवाले के लिए (वि+अतीन्) = विशिष्ट गतिवाले (सुयुक्तान्) = उत्तमता से शरीररथ सम्बद्ध [में जुते हुए] इन्द्रियाश्वों को (उप अफाणयत्) = समीपता से प्राप्त कराता है। वह प्रभु (तक्व:) = हमारे यज्ञों में प्राप्त होनेवाले हैं। वस्तुतः प्रभु ही हमें यज्ञों के प्रति प्राप्त कराते हैं। (प्रभु नेता) = वे प्रभु ही हमें मार्ग पर ले- चलनेवाले हैं नेता होते हैं तो (तद् इत्) = तब ही यह उपासक (वपुः) = सब बुराइयों का वपन [छेदन] करनेवाला होता है। (उपमा) = ये औरों के लिए उपमानभूत हो जाता है। ऐसा बन जाता है कि (यः अमुच्यत) = जो मुक्त हो जाता है। पवित्र जीवनवाले पुरुषों को लोग इससे उपमा देने लग जाते हैं यह तो पहले ऐसा पवित्र है, जैसा वह 'वपुः ' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करें। प्रभु हमें गतिशील सुयुक्त इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराके उत्तम मार्ग पर ले चलेंगे। हम बुराइयों का छेदन करके उपमानभूत जीवन को प्राप्त करेंगे- जीवनमुक्त से बन जाएँगे।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That soul is Indra, man of self control and self power, who withdraws his scattered powers of senses and mind, turns them inward and applies them into meditation for the sake of generosity of the spirit, and then as their patient master and leader, with the power and grace of his self-possession, releases and relaxes them in the state of peace. He is the sovereign soul.